रीवा में पौष माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी के दिन शिव आराधना का विशेष महत्व माना जाता है। जहां सोहागी पहाड़ पर स्थित अड़गड़नाथ धाम और तराई अंचल में शनिवार को मेले का आयोजन किया गया। विशेष रूप से सोहागी पहाड़ पर मौजूद अड़गड़नाथ धाम में बड़ी संख्या में श्रद्धालु शिव आराधना और मेले का लुफ्त उठाने पहुंचे। बताया गया कि सोहागी पहाड़ पर 100 साल से भी अधिक समय से पौष माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी के दिन पर यह परंपरा चली आ रही है। मंदिर के पुजारी ने बताया कि अड़गड़नाथ धाम एक प्राचीन मंदिर है। जहां के शिव स्वयं प्रकट माने जाते हैं। हजारों भक्तों की आस्था इस मंदिर से जुड़ी हुई है। यहां साल में एक बार ही मेले का आयोजन किया जाता है। इस दिन भगवान शिव का पंचगव्य से अभिषेक और मंत्र जाप किया जाता है। पौष मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी पर यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है, जिसका निर्वहन आज भी किया जा रहा है। स्थानीय निवासी गौरव शुक्ला ने बताया कि त्योंथर और चाकघाट क्षेत्र में शिव मंदिरों के पास मेले का आयोजन संपन्न हुआ। सोहागी पहाड़ पर स्थित अड़गड़नाथ धाम में शिव-पार्वती के प्रचीन मंदिर में 100 सालों से भी अधिक समय से विशाल मेला लगता है। सोनौरी क्षेत्र के मंडपेश्वर नाथ के धाम में भी मेला लगता है। मण्डपिया के मेले की कथा आजादी के आंदोलन से जुड़ी है। जब अंग्रेजों के शासन काल में यहां एकत्र हुए लोग आजादी के लिए रणनीति बनाया करते थे। ग्राम पंचायत कोनी के टेढ़नाथ मंदिर में शिव पूजा के साथ टेढ़े का मेला लगता है। चाकघाट के पास ग्राम देवरा में भी मेले का आयोजन होता है। देवरा ग्राम कभी बघेल राज्य से संबंधित कसौटा राज्य की राजधानी थी। जो बाद में शंकरगढ़ में स्थापित हुई थी। चाकघाट के टमस नदी के तट पर शिव मंदिर में भी इस दिन भक्तों की भीड़ लगती है। चाकघाट के समीप टमस और बेलन नदी के संगम पर स्थित ग्राम गौरा के शिव मंदिर के समीप मेले का आयोजन प्राचीन समय से होता आ रहा है। इस दिन किसान,मजदूर और ग्रामीण सारे काम बंद करके पूसी तेरस के इस मेले का आनंद लेते हैं। स्थानीय निवासी विष्णु तिवारी ने बताया कि प्रशासन को जिस तरह से व्यवस्था बनानी चाहिए थी। उस तरह की व्यवस्था नजर नहीं आई। पार्किंग सहित अन्य व्यवस्था प्रभावित दिखी।


