संसाधन विहीन संक्रामक रोग अस्पताल… आईसीयू तो दूर की बात, यहां जरूरी दवा और हैंड सैनिटाइजर तक नहीं

राजधानी रांची का संक्रामक रोग अस्पताल (आईडीएच) गंभीर मरीजों के लिए ‘आखिरी सहारा’ माना जाता है। राज्यभर से रेबीज और टेटनस जैसे गंभीर संक्रमण मामलों के लिए मरीज यहां भेजे जाते हैं। लेकिन हालात ऐसे हैं कि यहां मरीजों का इलाज भगवान भरोसे ही चल रहा है। अस्पताल में न तो आईसीयू की व्यवस्था है और न ही विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम। यही नहीं, जरूरी इंजेक्शन और दवाइयों की सप्लाई भी नियमित रूप से नहीं हो पाती। संक्रामक रोग अस्पताल में सबसे पहली प्रा​थमिकता साफ-सफाई की होती है। पर यहां वार्ड में गंदगी फैली हुई है। पूरे वार्ड में सीलन है। जमीन पर काई तक लग गई है। और तो और सबसे बेसिक जरूरत है हैंड सैनिटाइजर, जो यहां उपलब्ध नहीं है। संक्रामक रोग अस्पताल में सालों से डॉक्टरों के केवल तीन स्वीकृत पद हैं, जबकि वर्तमान में सिर्फ दो ही कार्यरत हैं। इनमें एक चिकित्सा अधीक्षक और एक चिकित्सा पदाधिकारी हैं। चिकित्सा उपाधीक्षक का पद वर्षों से खाली पड़ा है। अस्पताल में नर्सों की संख्या भी सिर्फ तीन है। ऐसे में गंभीर मरीजों को समुचित इलाज देना संभव ही नहीं हो पाता। सुधार की जरूरत, ध्यान दे विभाग राजधानी का यह संक्रामक रोग अस्पताल, जहां गंभीर मरीजों को राहत और सुरक्षा मिलनी चाहिए थी, आज खुद गहरे संकट में है। आईसीयू, विशेषज्ञ डॉक्टर और दवाओं की स्थायी आपूर्ति जैसी बुनियादी सुविधाओं के अभाव में अस्पताल का अस्तित्व ही सवालों के घेरे में है। अगर समय रहते सरकार और विभाग ने ठोस कदम नहीं उठाए, तो यह अस्पताल नाम के लिए तो रहेगा, लेकिन इलाज की उम्मीद रखने वाले मरीजों के लिए आखिरी सहारा कभी नहीं बन पाएगा। नया भवन प्रस्तावित, इंजीनियर तक कर चुके हैं साइट विजिट डॉ. रितेश रंजन ने बताया कि अस्पताल के लिए नया भवन बनाने का प्रस्ताव विभाग को भेजा गया है। हाल ही में इंजीनियरों की टीम ने साइट का निरीक्षण भी किया है। लेकिन अब तक यह तय नहीं है कि निर्माण कार्य कब से शुरू होगा। बता दें कि जबतक नया भवन नही बन जाता तब तक मरीजों को पुराने और जर्जर अस्पताल में ही इलाज कराना पड़ेगा। इलाज की उम्मीद लेकर आते हैं लोग, निराश होकर लौटते हैं… रेबीज जैसे मामलों में आईसीयू ही उनकी जिंदगी कुछ देर या कुछ दिनों तक बचा सकता है। लेकिन आईसीयू न होने के कारण यहां गंभीर अवस्था वाले मरीजों को भर्ती तक नहीं किया जाता। यानी जो मरीज यहां इलाज की उम्मीद से आते हैं, वे और अधिक निराश होकर लौटते हैं। खस्ता हाल भवन और सुविधाएं : वार्ड में पुराने समय के बेड पड़े हैं। रोशनी के नाम पर एक-दो बल्ब जलते हैं। शौचालय की व्यवस्था इतनी खराब है कि मरीज और उनके परिजन दोनों परेशान रहते हैं। अस्पताल की दीवारें बेजान हो चुकी हैं व बाहर की दीवारों पर काई जम चुकी है। लोकल पर्चेज से खरीदी जाती है दवा : जानकारी लेने पर अस्पताल के चिकित्सा पदाधिकारी डॉ. रितेश रंजन ने बताया कि जरूरी दवाइयों की नियमित सप्लाई नहीं हो पा रही है। वजह यह है कि टेंडर निकालने पर कोई भी एजेंसी दवा आपूर्ति में रुचि नहीं दिखाती। ऐसे में लोकल पर्चेज के जरिए ही दवा की व्यवस्था करनी पड़ती है। हालांकि उनका दावा है कि कोशिश यही रहती है कि मरीजों को कमी महसूस न हो। लेकिन जब सप्लाई ही अस्थिर हो तो व्यवस्था पर सवाल उठना लाजिमी है। अस्पताल के रजिस्टर से पता चला मरीज महीने में एक-दो ही आते हैं। दैनिक भास्कर, रांची सोमवार, 18 अगस्त, 2025 |05

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