राजनगर| शुक्रवार शाम को राजनगर थाना क्षेत्र के डांडू में मकान ढहने से हादसे में मृत खोकरो गांव के शांति घांटरा (लोहार) व उसके सात वर्षीय पुत्र अरविंद घांटरा के शव को कब्जे में लेकर पुलिस ने पोस्टमार्टम कराया। ज्ञात हो कि मौत हो जाने के बाद परिजन शव को सीधे गांव लेकर आए थे। एमजीएम में शवों का पोस्टमार्टम नहीं कराया गया। शनिवार सुबह थाना प्रभारी चंचल कुमार एवं सीओ के निर्देश पर अंचल के उपनिरीक्षक खोकरो व डांडू गांव पहुंचे। परिजनों को समझा बुझा कर शव को पोस्टमार्टम के लिए सरायकेला भेजा गया। वहीं, अंचल उपनिरीक्षकों ने मकान की क्षति का आकलन किया। वहीं, पीड़ित परिवार के लिए न्याय समाजसेवी अजय कुमार गोप ने प्रशासन से मांग किया है कि मृतकों के परिजनों को उचित मुआवजा दिया जाए। संतोष लोहार सहित सभी असली जरूरतमंद परिवारों को तत्काल पक्का आवास उपलब्ध कराया जाए। भास्कर न्यूज | राजनगर सरकारें गरीबों को पक्का मकान देने के बड़े-बड़े दावे करती हैं। प्रधानमंत्री आवास योजना हो या आबुआ आवास, इन योजनाओं का उद्देश्य है कि कोई गरीब खुले आसमान तले न सोए, किसी का परिवार बारिश और तूफान से उजड़े नहीं। परंतु हकीकत इससे बिल्कुल अलग है। सरकारी बाबुओं और पंचायत प्रतिनिधियों की लापरवाही ने अब सीधे-सीधे दो निर्दोष लोगों की जानें ले लीं। राजनगर प्रखंड के गोविंदपुर पंचायत अंतर्गत डांडू गांव के संतोष लोहार का जर्जर खपरैल मकान शुक्रवार की भारी बारिश में ढह गया। मकान गिरने से उस समय घर में मौजूद संतोष की भगनी शांति लोहार और उसका सात वर्षीय बेटा की दबकर मौत हो गई। दोनों खोकरो गांव के रहने वाले थे। शांति अपना बेटा व पति के साथ मामा संतोष के घर डांडू गई थीं, लेकिन हादसे में दोनों की मौत हो गई। यह दर्दनाक हादसा उस सरकारी उपेक्षा का नतीजा है, जिसकी ओर तीन माह पहले ही अखबारों के माध्यम से प्रशासन को आगाह किया गया था। संतोष लोहार का परिवार वर्षों से कच्चे मकान में रह रहा था। बारिश में छत टपकती थी तो प्लास्टिक ढककर किसी तरह परिवार गुजारा करता था। संतोष ने कई बार सरकार आपके द्वार शिविर में आवेदन दिया, यहां तक कि पंचायत की मुखिया सानो टुडू को सीधे आवेदन सौंपा। लेकिन जवाब मिला आप घर लेकर क्या करेंगे? आप तो घर बना ही नहीं पाएंगे। यह कथन सिर्फ उपेक्षा नहीं, बल्कि गरीब परिवार का अपमान था। प्रशासन और पंचायत की लापरवाही उजागर : जब सक्षम और अमीर परिवारों को एक-एक घर में दो-दो आवास योजनाओं का लाभ मिल रहा है, वहीं असली जरूरतमंद संतोष जैसे परिवार को केवल ठोकरें और ताने मिल रहे हैं। सवाल उठता है कि क्या आवास योजना सिर्फ कागज पर काम पूरा दिखाने के लिए है। क्या गरीबों को मरने के बाद ही उनकी लाचारी का प्रमाण माना जाएगा। आखिर क्यों प्रशासनिक तंत्र और पंचायत प्रतिनिधि अपने कर्तव्यों से मुंह मोड़ते रहे। शांति लोहार और उसके मासूम बेटे की मौत सीधे-सीधे प्रशासनिक लापरवाही का परिणाम है। यदि समय रहते संतोष लोहार को आवास स्वीकृत होता, तो यह हादसा टल सकता था। अब सवाल उठता है कि क्या जिला प्रशासन और पंचायत के जिम्मेदार इस मौत की जिम्मेदारी लेंगे। पीड़ित परिवार के लिए न्याय की मांग : गांव के लोगों ने प्रशासन से मांग किया है कि मृतकों के परिजनों को उचित मुआवजा दिया जाए। संतोष लोहार सहित सभी असली जरूरतमंद परिवारों को तत्काल मुआवजा और पक्का आवास उपलब्ध कराया जाए।


