80 के दशक में हुई थी अघोर गणेश की प्रतिमा की स्थापना

भास्कर न्यूज | जशपुरनगर शनिवार को गणेश चतुर्थी के अवसर पर जिले के अघोर परंपरा से जुड़े प्रमुख आश्रमों-श्री सर्वेश्वरी अघोरेश्वर आश्रम चिटकवाईन (नारायणपुर), गम्हरिया और सोगड़ा आश्रम में तांत्रिक विधि से भगवान गणेश की पूजा-अर्चना की गई। अघोर परंपरा में गणेश को सिर्फ विघ्नहर्ता के रूप में नहीं, बल्कि तंत्र और साधना के मूल आधार स्वरूप में भी पूजनीय माना जाता है। विशेषकर उन साधकों के लिए जो गूढ़ तांत्रिक साधनाओं की ओर अग्रसर होते हैं, उनके लिए तांत्रिक गणेश की उपासना अनिवार्य मानी जाती है। इस मौके पर तांत्रिक स्वरूप गणपति की प्रतिमा के समक्ष विधिपूर्वक पूजन, मंत्र जाप, हवन और महाआरती की गई। श्रद्धालुओं ने परंपरागत ढोल, मंजीरे और अन्य वाद्य यंत्रों के साथ भक्ति संगीत में लीन होकर गणपति बप्पा का स्मरण किया। पूजा में पवित्रता और नियमों का विशेष ध्यान रखा गया। अघोर परंपरा में भगवान गणेश को रिद्धि, सिद्धि, बुद्धि और आत्मबल का प्रतीक माना जाता है। संस्कृत विद्वान डॉ. बीएन उपाध्याय बताते हैं कि तांत्रिक गणेश की उपासना साधकों के लिए विशेष फलदायी होती है। उनके अनुसार, यह पूजा सिर्फ आस्था का विषय नहीं, बल्कि आंतरिक और बाह्य विघ्नों से मुक्ति का साधन है। उन्होंने बताया कि नारायणपुर स्थित तांत्रिक गणेश की प्रतिमा के दर्शन मात्र से ही भक्तों की कई मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। यहां आकर श्रद्धालु भगवान गणेश की तीन बार परिक्रमा करते हैं, जिससे गणपति प्रसन्न होते हैं। ऐतिहासिक जानकारी के अनुसार, श्री सर्वेश्वरी अघोरेश्वर आश्रम चिटकवाईन और सोगड़ा स्थित ब्रह्म निष्ठालय में 1980 के दशक में अघोर परंपरा के प्रमुख संत बाबा भगवान राम द्वारा तांत्रिक गणेश की प्रतिमा की स्थापना की गई थी। यह प्रतिमा जिले में ही नहीं, बल्कि पूरे छत्तीसगढ़ में अपनी तरह की एकमात्र मानी जाती है। हर वर्ष गणेश चतुर्थी के दिन इस प्रतिमा की विशेष पूजा की जाती है, लेकिन इस वर्ष शनिवार को पर्व विशेष संयोग के साथ आया, जिससे श्रद्धालुओं की संख्या भी अधिक रही। चिटकवाईन आश्रम के बाबा उत्साही राम द्वारा विधिपूर्वक पूजा संपन्न कराई गई।

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