पढ़ने की आदत नई पीढ़ी में फिर से जीवित करें

युवाओं के बीच एक आम समस्या तनाव और बेचैनी है। सोशल मीडिया पर अधिक समय बिताने से मानसिक थकान और असंतुलन बढ़ता है। ऐसे में किताबें पढ़ना मानसिक शांति का सबसे आसान उपाय बनता है। किताबों की पंक्तियां मन को सुकून देती हैं और पाठक को भीतर से मजबूत बनाती हैं। बच्चों को अगर शुरुआती उम्र में ही किताबों की ओर प्रेरित किया जाए तो उनमें नैतिक मूल्यों और भाषा का गहरा विकास संभव है। प्रीत का कहना है कि बच्चों को 8 से 10 साल की उम्र से कहानी की किताबें पढ़ने को देनी चाहिए। यह आदत न सिर्फ उनकी कल्पनाशीलता को बढ़ाती है बल्कि उनकी रुचियों को भी विकसित करने में मदद करती है। साहित्यकारों और शिक्षाविदों का सुझाव है कि शैक्षणिक संस्थानों को पुस्तकालयों को सक्रिय बनाना चाहिए। केवल किताबों का संग्रह पर्याप्त नहीं है, बल्कि छात्रों को पढ़ने के लिए प्रेरित करने वाले आयोजन जरूरी हैं। ‘बुक रीडिंग क्लब’ इसी दिशा में एक सफल पहल हो सकती है। भास्कर न्यूज| लुधियाना आज का समय डिजिटल क्रांति का है। हर हाथ में मोबाइल, हर घर में इंटरनेट और हर व्यक्ति के जीवन में सोशल मीडिया का दखल है। सुबह से शाम तक युवा वर्ग अपनी दिनचर्या का बड़ा हिस्सा तकनीकी साधनों पर खर्च कर रहा है। जानकारी, मनोरंजन और संवाद के तमाम नए माध्यमों के बीच किताबें मानो कहीं पीछे छूटती जा रही हैं। लेकिन साहित्यकार मनोज कुमार प्रीत मानते हैं कि बदलते समय में भी किताबें पढ़ने की आदत वह परंपरा है, जो व्यक्ति के भीतर संवेदनाओं, प्रेम और नैतिक मूल्यों की नींव को मजबूत करती है। उनका कहना है कि किताबों की दुनिया ही वह जगह है, जहां व्यक्ति खुद को सबसे करीब पाता है और समाज को गहराई से समझने की क्षमता विकसित करता है। तकनीक हमें सूचनाएं तो देती है, लेकिन वह भावनाओं की दुनिया से हमें दूर कर रही है। किताबें हमें ठहरना सिखाती हैं, सोचने-समझने की नई दिशा देती हैं और रिश्तों की गहराई का एहसास कराती हैं। यही कारण है कि पढ़ने वाले लोग न केवल ज्यादा संवेदनशील होते हैं, बल्कि जीवन के कठिन दौर में भी अधिक संतुलित और धैर्यवान रहते हैं। युवाओं के बीच आयोजित चर्चाओं से भी ये तथ्य सामने आया है कि किताबें पढ़ने से तनाव कम होता है और व्यक्ति अपनी भावनाओं को बेहतर तरीके से पहचान पाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि स्कूलों और कॉलेजों में पुस्तकालयों की भूमिका बेहद अहम है और ‘बुक रीडिंग क्लब’ जैसी पहल युवाओं को पुस्तकों से जोड़ने का सफल माध्यम बन सकती है। प्रीत का कहना है कि आज जरूरत है कि समाज मिलकर किताबों को पढ़ने की आदत को नई पीढ़ी में फिर से जीवित करे। उन्होंने चेतावनी भी दी कि अगर हम डिजिटल साधनों में पूरी तरह उलझ गए तो रिश्तों और भावनाओं के बीच दूरी बढ़ती जाएगी। ऐसे में किताबें ही वह सेतु है, जो इंसान को इंसान से जोड़कर समाज में प्रेम, करुणा और संवेदनशीलता को बनाए रख सकती हैं। वे कहते हैं कि किताबें केवल ज्ञान का भंडार नहीं, बल्कि भावनाओं का आइना भी हैं। कहानियां, उपन्यास और कविताएं हमें समाज की वास्तविकता से जोड़ती हैं। यह साहित्य ही है, जो करुणा, सहयोग और सहिष्णुता जैसे मूल्यों को हमारे भीतर गहराई से स्थापित करता है।

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