वन विभाग द्वारा ट्रांसफर परमिट (टीपी) नहीं होने के नाम पर कई बार न केवल वाहनों को जब्त कर लिया जाता है बल्कि लकड़ी भी राजसात कर ली जाती है। ऐसे ही एक मामले में हाई कोर्ट ने किसान से उसकी जमीन पर लगे पेड़ों काे काटने और लकड़ी का परिवहन कराने वाले कॉन्ट्रैक्टर की याचिका पर महत्वपूर्ण फैसला दिया है। हाई कोर्ट ने इंदौर और धार वन मंडल को आदेश दिए हैं कि याचिकाकर्ता को डिपो में रखी लकड़ी बेचने की अनुमति दी जाए और परिवहन अनुमति भी जारी की जाए। याचिकाकर्ता जीवन ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। इसमें उल्लेख किया कि एक किसान से उसकी निजी जमीन पर लगे बबूल के पेड़ों को काटने और फिर लकड़ी बेचने का कॉन्ट्रैक्टर किया था। 95 हजार रुपए में यह करार हुआ था। पेड़ों काे काटने से पहले बाकायदा ग्राम पंचायत से अनापत्ति ली गई थी। इसमें वन विभाग का कर्मचारी भी रहता है, उसकी सहमति भी शामिल थी। लकड़ी को काटने के बाद जब परिवहन कर इंदौर लाने की बात आई तो वन विभाग ने कॉन्ट्रैक्टर को टीपी देने से इनकार कर दिया। उससे कहा गया कि वह खुद पेड़ों का मालिक नहीं है बल्कि कॉन्ट्रैक्टर है। उसे अनुमति नहीं दी जा सकती है। वहीं कुछ लकड़ी इंदौर स्थित डिपो में भेजी गई थी, उसकी बिक्री भी विभाग ने नहीं होने दी। मप्र टीपी रूल्स 2000 के तहत जमीन मालिक या उसका कॉन्ट्रैक्टर लेने वाले को लकड़ी का परिवहन से रोका नहीं जा सकता। क्या है टीपी रूल्स 2000 नीलगिरी, केसूरिना, सू बबूल, पोपलर, इजरायली बबूल, विलायती बबूल, कटंग बबूल के परिवहन पर किसी तरह की टीपी लेने की जरूरत नहीं है। भूमि स्वामी की जमीन पर लगे एेसे पेड़ जो जलाने के काम आते हैं उनके परिवहन के लिए अनुमति लेनी होगी। भूस्वामी या कॉन्ट्रैक्टर को ग्राम पंचायत से अनुमति लेना होगी। बबूल, सीरिस, नीम, बेर, पलाश, जामुन इसमें शामिल हैं।


