राजस्थान का अर्द्धकुंभ सुईयां मेला बाड़मेर के चौहटन में शुरू हो चुका है। बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं पहुंच रहे हैं। रविवार की रात भजन संध्या का आयोजन होगा। सोमवार को सुबह करीब 6 बजे से शाम 5 बजे तक पंच योग में पवित्र स्नान किया जाएगा। इससे पहले श्रद्धालु पानी की बोतलों में पवित्र जल लेकर जा रहे हैं। वहीं सुईयां महादेव और कपालेश्वर महादेव मंदिर के दर्शन कर रहे हैं। मेले में बच्चों के लिए झूले भी लगे है। चौहटन कस्बा धर्मनगरी के नाम से भी प्रसिद्ध है। यहां पर डूंगरपुरी मठ और महादेव मंदिर के स्थान को अति प्राचीन और ऐतिहासिक माना जाता है। पढ़िए… पांडवों की तपोस्थली और धर्मनगरी चौहटन में जुडी कहानियां सदियों से चल रहा है झरना सुईयां महादेव धाम के पास में ही पहाड़ में सदियों से झरना चल रहा है। ऐसा माना जाता है कि यह आज दिन तक कभी बंद नहीं हुआ। इस रहस्य में झरने में पानी कहां से आता है। इसका पता लगाने के लिए कई लोगों ने प्रयास किया। लेकिन आज दिन तक इस चमत्कारी झरने की कोई जानकारी नहीं मिली। इस गोमुख झरने को लोग गंगा की धार बताते है। विक्रम संवत के अनुसार पौष माह, अमावस्या, सोमवार, मूल नक्षत्र, व्यातिपात योग का योग एक ही समय में मिलने पर ही सुईयां का पवित्र स्नान मेला लगता है। इस पांच योग के पवित्र संगम पर पांच पवित्र स्थलों के पवित्र जल से श्रद्धालु स्नान करते है। सुईयां महादेव मंदिर का झरना, कपालेश्वर महादेव मंदिर का झरना, धर्मराज की बेरी व इंद्रभान तालाब के पांच स्थलों के पवित्र मिश्रित जल से स्नान करेंगे। प्राकृतिक काले रंग का शिवलिंग झरने के पास ही सुईयां महादेव मंदिर में प्राकृतिक काले रंग का शिवलिंग स्थापित है, जो लोगों के लिए धार्मिक आस्था व आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। भैरू भंडार, जहां प्रसादी बनाई जाती थी मारवाड़ का मरू कुंभ व अर्द्ध सुईया धाम मेले का आयोजन डूंगरपुरी महाराज मठ की ओर से करवाया जाता है। इस मठ से भी कई चमत्कारिक व रोचक कहानी जुड़ी हुई है। जिसमें बड़ा भैरू भंडार जिसमें एक बड़ा कड़ा और देग रखा हुआ है। ऐसी मान्यता है कि इस कड़ाव में जब भी प्रसादी बनाई जाती है। कितने भी भक्त इस प्रसाद को ग्रहण कर ले, लेकिन इस कड़ाव में बनी प्रसाद कभी खत्म नहीं हुई। प्रसाद को बनाने के लिए जो भी व्यक्ति भैरू भंडार में प्रवेश करने से पहले वह इंद्राबाण झरने के पानी से स्नान कर अपने आप को पवित्र करता है। उसके बाद मुंह पर कपड़ा बांधकर ही प्रसाद बनता है। जब तक प्रसाद बना नहीं जाता तब तक वह उसे भंडार से बाहर नहीं आता है। डूंगरपुरी जी का ढोलिया मठ के अंदर प्राचीन तपस्वी डुंगरपुरी महाराज का एक ढोलिया रखा हुआ है। इस ढोलिया पर शेर की खाल बिछी हुई है। ऐसी मान्यता है कि डूंगरपुरी जी महाराज ने इसी डोलिया पर बैठकर तपस्या की थी। मठ की चमत्कारिक जाल ऐसी मान्यता है कि पहाड़ी पर बने डूंगरपुरी जी महाराज के इस मठ में एक जाल का वृक्ष है और अमावस्या के दिन इस पौधे से मिश्री जैसा मीठा सफेद पदार्थ गिरता है। जिसको लोग प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं। मठ के आगे ही इंद्रभाण नमक तालाब बना हुआ है। ऐसी मान्यता है की मठ में जब भी प्रसादी बनती है। तो प्रसाद बनाने वाले व्यक्ति इसी तालाब के पानी से स्नान कर अपने आप को पवित्र करने के बाद ही प्रसादी बनाते हैं। देखिए… मेले से जुडे़ फोटोज


