जैसलमेर में प्रवासी पक्षी कुरजां​ मिला घायल:हाईटेंशन लाइन से टकराया, इलाज कर जंगल में छोड़ेगा वन विभाग

जैसलमेर के छोड़िया गांव की सरहद में घायल प्रवासी पक्षी मिला। पर्यावरण प्रेमी सुमेर सिंह ने वन विभाग की टीम को जानकारी दी। वन विभाग की टीम ने पक्षी का रेस्क्यू किया। अब वन विभाग की टीम पक्षी का इलाज करवा जंगल में सुरक्षित छोड़ेगी। बताया जा रहा है कि इलाके से गुजर रही बिजली की हाईटेंशन लाइनों से टकराकर कुरजां पक्षी घायल हुआ है। वन्य जीव प्रेमी सुमेर सिंह भाटी ने बताया कि छोड़िया गांव की सरहद में 1 कुरजां पक्षी घायल अवस्था में ग्रामीणों को नजर आया। वन विभाग की टीम करवाएगी इलाज गांव की सरहद से गुजर रहे ग्रामीणों ने घायल कुरजां पक्षी को देखा। ग्रामीणों ने उसी दौरान वन्यजीव प्रेमी सुमेरसिंह भाटी को इसकी सूचना दी। देगराय ओरण इलाके में घूम रहे सुमेर सिंह तुरंत घायल पक्षी की जानकारी वन विभाग को दी। वन विभाग की टीम मौके पर पहुंचकर कुरजां को बड़ी मशक्कत के बाद रेस्क्यू किया। वन विभाग की टीम कुरजा पक्षी को अपने साथ ले गई।अब इलाज के बाद उस वापस जंगल में छोड़ा जाएगा। पर्यावरण प्रेमी सुमेर सिंह ने बताया कि इलाके में हाईटेंशन तारों की चपेट में आने से आए दिन पक्षी घायल हो रहे हैं, जबकि जिम्मेदार सुरक्षा को लेकर कोई ध्यान नहीं दे रहे हैं। इस तरह तो प्रवासी पक्षी धीरे-धीरे यहां आना ही बंद कर देंगे। जिम्मेदारों को चाहिए कि वे तारों को अंडरग्राउंड करें। हजारों मील का सफर कर जैसलमेर आती है कुरजां पर्यावरण प्रेमी सुमेर सिंह भाटी ने बताया कि भारत में खासकर पश्चिमी राजस्थान जैसे गरम इलाके में सितंबर और अक्टूबर महीने से फरवरी तक शीतलहर चलती है। इस लिहाज से इस पक्षी के लिए ये मौसम काफी अनुकूल रहता है। इस दौरान करीब 5 से 6 महीने के लिए कुरजां पश्चिमी राजस्थान में अलग-अलग जगहों पर अपना डेरा डालती है। जैसलमेर जिले के लाठी, खेतोलाई, डेलासर, धोलिया, लोहटा, चाचा, देगराय ओरण सहित अन्य जगहों पर कुरजां ही कुरजां नजर आ रही है। इन पक्षियों के आने से पर्यावरण प्रेमी और पक्षी प्रेमी काफी खुश है और वे इन इलाकों में घूम-घूमकर शोध भी कर रहे हैं। गौरतलब है कि दक्षिण पूर्वी यूरोप एवं अफ्रीकी भू-भाग में डेमोसाइल क्रेन के नाम से विख्यात कुरजां पक्षी अपने शीतकालीन प्रवास के लिए हर साल हजारों मीलों उड़ान भरकर भारी तादाद में क्षेत्र के देगराय ओरण और लाठी इलाके के तालाबों तक आते हैं। मेहमान परिंदों का आगमन सितंबर महीने के पहले हफ्ते से शुरू हो जाता है और करीब 6 महीने तक प्रवास के बाद मार्च में वापसी की उड़ान भर जाते हैं।

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