स्टेट जीएसटी विभाग की बड़ी कार्रवाई:26 फर्जी फर्मों से 822 करोड़ के ई-वे बिल बनवाए, रिटर्न कम, सौ करोड़ की टैक्स चोरी

रायपुर में छापेमारी के दौरान प्रदेश में फर्जी फर्मों से बोगस बिल बनाकर जीएसटी चोरी का बड़ा मामला उजागर हुआ है। स्टेट जीएसटी विभाग को ऐसी करीब 170 बोगस फर्मों का पता लगाया है। इसमें 26 फर्जी फर्मों से ही 822 करोड़ का ई-वे बिल जनरेट किया गया है। इस तरह करीब 100 करोड़ की टैक्स चोरी गई। दावा किया जा रहा है​ फर्जी बोगस फर्म बनाने का ये अब तक का सबसे बड़ा मामला है। इसके मास्टरमाइंड मोहम्मद फरहान सोरठिया का लोधीपारा पंडरी में ऑफिस है। वह जीएसटी सलाहकार के रूप में काम करता है। राज्यभर के कई कारोबारियों से उसका संपर्क है। वह फर्जी फर्मों से बोगस बिल बनाकर देने का दावा करता था। जीएसटी की बीआईयू टीम उसके बारे में एक महीने से जांच कर रही थी। 12 सितंबर को फरहान के दफ्तर में छापा मारा गया। जांच के दौरान 172 फर्जी फर्मों की जानकारी मिली। उसके दफ्तर से बड़ी संख्या में बोगस पंजीयन के लिए किरायानामा, सहमति पत्र और शपथ पत्र मिले हैं। जीएसटी की टीम ने राजातालाब के रहने वाले फरहान के चाचा मोहम्मद अब्दुल लतीफ सोरठिया के घर में जांच की। वहां से अफसरों को 1.64 करोड़ कैश और 400 ग्राम सोना मिला है। कंपनी बोगस फर्में नहीं बनातीं, प्रॉफिट कम दिखाने के लिए उनसे खरीदती हैं फर्जी बिल भास्कर एक्सपर्ट भीष्म अहलूवालिया, एडवोकेट, जीएसटी मामलों के विशेषज्ञ ऐसे बनती है फर्जी कंपनी आमतौर पर मैन्युफेक्चर कंपनी बोगस कंपनी नहीं बनाती है। आजकल फर्जी बिल देने वाली बोगस कंपनियां अलग होती हैं। कंपनियों का रजिस्ट्रेशन आसानी से हो जाता है। कोई भी कंपनी बनाने के लिए दो डायरेक्टरों की जरूरत होती है। फेक या फर्जी कंपनी बनाने वाले अपने दोस्तों, रिश्तेदारों या नौकरों के नाम पर रजिस्टार ऑफ कंपनी में ऑनलाइन या ऑफलाइन आवेदन करते हैं। इसमें डायरेक्टरों के पेन कार्ड और आधार कार्ड के साथ फार्म में जरूरी जानकारी के साथ किसी भी ऑफिस का पता देते हैं। कंपनी में रजिस्ट्रेशन के बाद जीएसटी नंबर लेते हैं। इस तरह कागजों में कंपनी बन जाती है। आजकल फर्जी बिलों का खेल इतना बढ़ गया है कि एक पते पर 30-40 कंपनियों का रजिस्ट्रेशन हो जाता है। कंपनी ऑफ रजिस्ट्रार के लिए फील्ड पर जांच करना अनिवार्य नहीं है। वहीं, जीएसटी विभाग के पास भी इतना अमला नहीं है कि वह हर कंपनी को चेक करे। इसलिए फेक कंपनी बनाने वाले इसका फायदा उठा रहे हैं। टैक्स बचाने के लिए खरीदते हैं फर्जी बिल मैन्युफेक्चरर कंपनी टैक्स बचाने और कैश जनरेट करने के लिए फर्जी बिल खरीदती है। आमतौर पर किसी कंपनी का प्रॉफिट जब बढ़ने लगता है, तब कंपनी के संचालक टैक्स बचाने के लिए फर्जी बिल का उपयोग करते हैं। इसके लिए वे ब्रोकरों का सहारा लेते हैं। ब्रोकर कंपनी के जिम्मेदारों को फेक कंपनी के संचालकों तक पहुंचाते हैं। फेक कंपनी की ओर से असली कंपनी में उपयोग होने वाले किसी भी कच्चे माल का फर्जी बिल लिया जाता है। उस बिल के आधार पर जीएसटी चुका दिया जाता है। इससे कंपनी का खर्च बढ़ जाता है और प्रॉफिट कम दिखने लगता है। इससे टैक्स भी कम अदा करना पड़ता है और कैश भी जनरेट हो जाता है। कभी-कभी ब्रोकर के चलतेफंस जाती हैं निर्माण कंपनियां कभी-कभी असली कंपनियां भी नकली बिल बनाने वाली फर्मों और दलालों का शिकार हो जाती हैं। निर्माण कंपनियां दलालों से धातु स्क्रैप जैसे कच्चे माल खरीदने के लिए कहती हैं। दलाल कबाड़ियों से नकद में स्क्रैप खरीदते हैं और नकली बिल बनाने वाली फर्मों से बिल लेकर निर्माताओं को सामान भेज देते हैं। इस तरह निर्माता इस बात से अनजान रहते हैं कि उन्होंने वास्तव में नकली फर्मों के साथ लेन-देन किया है और धोखाधड़ी का शिकार हो जाते हैं। जीएसटी विभाग निर्माताओं से इनपुट टैक्स क्रेडिट वसूलता है और क्रेडिट के बराबर जुर्माना भी वसूलता है। ऐसे पकड़े जा रहे: फेक कंपनी से माल खरीदी का जो बिल दिया जाता है, उसमें गाड़ी नंबर दिया जाता है। कागजों में दर्शाया जाता है कि उस गाड़ी से माल उनकी कंपनी तक पहुंचा है। जीएसटी विभाग उस गाड़ी नंबर को ट्रेस करता है। गाड़ी का परिवहन जिस इलाके में दिखाया जाता है, उस इलाके के टोल नाके के सीसीटीवी कैमरे से जांच की जाती है। बिल में जो समय दिया गया होता है उस आधार पर फुटेज चेक किया जाता है। जब ये पुख्ता हो जाता है कि उस टोल नाके से उस समय में गाड़ी गुजरी नहीं है, या वही गाड़ी उस समय में किसी और इलाके के टोल से गुजरी है, तब जीएसटी विभाग बाकी एंगल पर जांच कर छापेमारी करता है।

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