राजसमंद में श्रीनाथजी मंदिर में पहली बार जल सांझी दर्शन:15 दिनों से सांझी का क्रम आज पूरा हुआ

राजसमंद में पुष्टिमार्ग की प्रधानपीठ श्रीनाथजी मंदिर नाथद्वारा में पहली बार जल की सांझी का मनोरथ किया गया। इस अवसर पर लाडले लाल प्रभु को बगीचे में विराजित कर विशेष विधि से जल पर रंगों एवं आकृतियों का नयनाभिराम चित्रण किया गया। इस अद्भुत छवि के बीच विशाल बावा ने प्रभु की आरती उतारी एवं लाड लड़ाए। अमावस्या पर महादान का भोग अमावस्या के पावन अवसर पर तिलकायत व तिलकायत पुत्र विशाल बावा ने प्रभु को महादान का भोग अर्पित किया। वहीं कमल चौक में सांझी के अंतिम दिन रंग-बिरंगी पन्नियों से निर्मित कोट में द्वारका नगरी का चित्रण किया गया और विशेष सांझी आरती उतारी गई। ब्रज की परंपरा से जुड़ी सांझी लीला विशाल बावा ने बताया कि सांझी लीला भाद्रपद पूर्णिमा से प्रारंभ होकर लगातार 15 दिनों तक चलती है और अश्विन अमावस्या को विशेष आरती के साथ संपन्न होती है। उन्होंने कहा कि सांझी ब्रज की एक लोक देवी हैं जिनका पूजन संध्या वेला पर किया जाता है। परंपरा अनुसार ब्रज की कन्याएं दीवार पर गोबर से सांझी की छवि बनाकर फूलों और रंगों से सजाती हैं। अंतिम दिन इसका बड़ा रूप “कोट” के रूप में रखा जाता है। कलात्मक रूप में झलकी ब्रज लीलाएं वल्लभ संप्रदाय के मंदिरों में सांझी का कलात्मक रूप विशेष महत्व रखता है। नाथद्वारा हवेली में केले के पत्तों से बनाए गए चित्रण में ब्रज की लीलाओं, उपवनों, मोर-बंदर, सरोवर और राधा-कृष्ण झांकियों का भावपूर्ण चित्रण किया गया। अंतिम दिन अमावस्या पर द्वारका नगरी का प्रतिरूप निर्मित कर ब्रज परिक्रमा की भावना को साकार किया गया। वल्लभ संप्रदाय के मंदिरों में सांझी का कलात्मक रूप विशेष महत्व रखता है। नाथद्वारा हवेली में केले के पत्तों से बने चित्रण में ब्रज की लीलाओं, उपवनों, मोर-बंदर, सरोवर, राधा-कृष्ण झांकियों का भावपूर्ण चित्रण किया जाता है। अंतिम दिन अमावस्या पर द्वारका नगरी का प्रतिरूप निर्मित कर ब्रज परिक्रमा की भावना को पूर्ण किया जाता है।

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