सिद्धपीठ जीणमाता मंदिर में आज (सोमवार) से शारदीय नवरात्र मेला शुरू हो चुका है। दोपहर 12:15 बजे घट स्थापना हुई। पहले दिन मां जीण भवानी को पटना, कोलकाता, दिल्ली, जयपुर और मुंबई से आई पांच पोशाकों से सजाया गया। सुबह की आरती 8:15 बजे हुई और शाम की आरती 7:15 बजे होगी। इसके बाद माता को फलों का भोग लगेगा। मां शैलपुत्री के रूप में दर्शन, कन्नौज के इत्र से श्रृंगार पहले दिन मां जीण भवानी शैलपुत्री स्वरूप में भक्तों को दर्शन देंगी। कन्नौज के इत्र और दिल्ली के फूलों से माता का भव्य श्रृंगार किया गया है। सोनीपत के कारीगरों ने मंदिर को भव्यता से सजाया है। भक्तों की सुविधा के लिए दर्शन व्यवस्था को सुगम बनाया गया है, जिसमें विकलांगों के लिए ई-रिक्शा की सुविधा भी शामिल है। पार्किंग और यातायात व्यवस्था जीणमाता कोछोर, दांतारामगढ़ और गोरिया रोड पर पार्किंग की व्यवस्था की गई है। खूड़ और मांडोली मार्ग से आने वाले भक्तों को मांडोली पार्किंग में वाहन खड़ा करना होगा। यह मार्ग वन-वे रहेगा। 470 पुलिसकर्मी तैनात, एसडीएम मोनिका मेला मजिस्ट्रेट कलेक्टर मुकुल शर्मा ने मेले में कानून व्यवस्था के लिए एसडीएम मोनिका सामोर को मेला मजिस्ट्रेट और तहसीलदार महिपाल सिंह राजावत को सहायक मेला मजिस्ट्रेट नियुक्त किया है। मेले में 470 पुलिसकर्मी तैनात रहेंगे, जिनमें 20 सादा वर्दी में ड्यूटी करेंगे। जीणमाता धाम आस्था और इतिहास का संगम सीकर से 29 किमी दूर जीणमाता धाम आस्था का प्रमुख केंद्र है। मंदिर में मां जीण की अष्टधातु की प्राचीन प्रतिमा शेर पर विराजमान है। मान्यता है कि द्वापर युग में पांडवों ने यहां मां की आराधना की थी। विक्रम संवत 1909 में सोमेश्वर सिंह चौहान ने मंदिर का जीर्णोद्धार कराया था। मंदिर परिसर में 64 योगिनी, गणेश, शंकर और भैरव मंदिर के साथ पुरी संप्रदाय का धूणा भी है। जीवण बाई से मां जीण: कठोर तप से बनीं देवी किंवदंती के अनुसार- मां जीण का नाम पहले जीवण बाई था। चूरू के घांघू गांव के चौहान परिवार में जन्मी जीवण बाई ने अपने भाई हर्षनाथ के साथ अरावली की काजल शिखर पहाड़ी पर तपस्या की। कठोर तप से वे देवी स्वरूप में परिणत हुईं और जीणमाता के नाम से प्रसिद्ध हुईं। मंदिर आठवीं शताब्दी का माना जाता है, जो संगमरमर और चूना पत्थर से बना है। इसकी स्थापत्य कला और शिलालेख इसकी प्राचीनता को दर्शाते हैं। मंदिर के पट कभी बंद नहीं होते मां जीण को रोज मीठे चावल और मदिरा का भोग लगता है। मंदिर के पट कभी बंद नहीं होते, और ग्रहण काल में भी आरती समय पर होती है। भक्त पुत्र प्राप्ति की मनोकामना लेकर आते हैं और संतान सुख मिलने पर जडूला संस्कार करते हैं। एक कथा के अनुसार- मुगल सम्राट औरंगजेब ने मंदिर को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की थी। लेकिन माता की शक्ति से विफल रहा और अखंड दीप दान किया, जो आज भी प्रज्ज्वलित है। ऊर्वशी और हर्ष-जीवण की तपस्या कहा जाता है कि अप्सरा ऊर्वशी ने अपने पुत्र हर्ष और पुत्री जीवण को इस स्थल पर छोड़ा था। दोनों की तपस्या से यह स्थान जीणमाता और हर्ष भैरवनाथ का पवित्र केंद्र बना। देशभर से भक्त यहां कुलदेवी के दर्शन के लिए आते हैं। जीणमाता धाम न केवल आध्यात्मिक, बल्कि सांस्कृतिक और ऐतिहासिक दृष्टि से भी अनूठा है।


