बांसवाड़ा जिले का एक गांव अपनी मिर्ची के लिए देशभर में पहचान रखता है। यहां की मिर्चियों का तीखापन खाने के स्वाद को और बढ़ा देता है। इसलिए दूसरे राज्यों से भी खरीददार यहां आते हैं। फाइव स्टार होटल्स, रेस्टोरेंट के शेफ भी यहां की मिर्ची को खासा पसंद करते हैं। हम बात कर रहे हैं मसोटिया मिर्च की। शहर से करीब 18 किलोमीटर दूर बस मसोटिया गांव आजादी से पहले से ही मिर्चियों के लिए फेमस रहा है। हालांकि, राजस्थान के मेवात, शेखावाटी, मारवाड़ रीजन में मिर्च का उत्पादन होता है, लेकिन इनके बीच मसोटिया में पैदा हो रही मिर्च अलग पहचान रखती है। क्योंकि बांसवाड़ा की जमीन बेहद उपजाऊ है। इस जिले की मिट्टी, पानी और जलवायु मिर्च की खेती के अनुकूल है। मिर्ची की खेती से इस गांव का हर किसान आर्थिक रुप से मजबूत है। बांसवाड़ा शहर से डूंगरपुर जाने वाले स्टेट हाईवे पर स्थित है गांव मसोटिया। यहां मिर्ची की खेती किसानों के लिए किसी परंपरा से कम नहीं है। यहां 80 साल से किसान अन्य फसलों के साथ मिर्ची की खेती आवश्यक तौर पर कर रहे हैं। किसी किसान के पास अगर 2 बीघा जमीन है तो वह एक बीघा में मिर्च जरूर बोता है। इसको लेकर हमने गांव के सरपंच वालेग भाई से बात की। उन्होंने बताया- हरी मिर्च मसोटिया गांव की पहचान बन चुकी है। किसान पीढ़ी दर पीढ़ी मिर्च की खेती करते हैं। इस गांव की मिट्टी ही ऐसी है कि मिर्च का बंपर उत्पादन होता है। इस बार सीजन अच्छा, हर किसान को मिल रहा मुनाफा किसी किसान के पास 20 बीघा खेत भी होंगे, तब भी वह एक-डेढ़ बीघा में मिर्च की फसल जरूर लगाता है। सितंबर से फरवरी तक मिर्च का सीजन चलता है। इन सात-आठ महीनों में मिर्च का उत्पादन करने वाला हर किसान लखपति बन जाता है। यहां से मिर्च स्थानीय बांसवाड़ा मंडी के साथ दूसरे राज्यों में जाती है। सरपंच ने बताया- सीजन में एक बीघा से हर किसान 15 से 20 क्विंटल तक उत्पादन ले लेता है। इससे उन्हें अच्छी आय होती है। कह सकते हैं कि मिर्च ने इस इलाके के किसानों की तकदीर बदल दी है। सीजन में किसानों को कैश में मुनाफा मिलता है। गांव में 250 के करीब मकान हैं। इनमें से 180 से अधिक परिवार मिर्च की खेती करते हैं। क्या है पौध लगाने लेकर फैसल तैयार करने तक का प्रोसेस? किसान भरत पटेल ने बताया- हमारे गांव में किसान प्रमुख रूप से सुजंटा, अवतार, कलर्स और नामधारी, कलश, तेजस और VNR वैराइटी की मिर्च का बीज लाते हैं। यह बीज बाजार में उपलब्ध हो जाता है। यह मिर्च तीखी होती है। दैनिक सब्जी के साथ यह अचार में भी इस्तेमाल होती है। नर्सरी तैयार करने के लिए साधारण किस्म के बीज 500 ग्राम प्रति हेक्टेयर और हाईब्रिड बीज 250 ग्राम पर्याप्त होते हैं। नर्सरी तैयार करने के लिए हम क्यारी की मिट्टी में दो तीन टोकरी वर्मी कम्पोस्ट या सड़ी गोबर की खाद के साथ 50 ग्राम फोरेट दवा मिलाते हैं। क्यारी को सामान्य धरातल से 15 सेमी ऊंचा उठाते हैं ताकि पानी जड़ में न ठहरे। बीज बुवाई से एक दिन पहले कार्बन-डाजिम दवा पानी में घोलकर क्यारी में डालते हैं। इसके बाद क्यारी में एक सेमी गहरी नालियां बनाते हैं। दो नालियों की दूरी 5 सेमी रखते हैं। क्यारी में बीज की बुवाई करने के बाद इसे सूखी घास, धान की पुआल या पत्तों से ढंक देते हैं। बीज अंकुरित होने के 10 दिन बाद कॉपर आक्सी-क्लोराइड दवा पानी में घोलकर छिड़काव करते हैं। पौधा जब 25 दिन का हो जाता है तो खेत में लगा देते हैं। किसान ने बताया- अगर बारिश कम हुई हो तो 15 दिन के अंतराल पर मिर्च में सिंचाई की जरूरत पड़ता है। मिट्टी दोमट हो तो 12 दिन में और ढालू मिट्टी हो तो 10 दिन में सिंचाई करते हैं। इस बात का ध्यान रखना जरूरी है कि मिर्च की फसल में पानी ठहरना नहीं चाहिए। वरना फल झड़ने लगता है। 7 महीने तक मिर्च का उत्पादन देता है पौधा गांव के किसान केरिंग पटेल ने बताया- इस गांव में सभी किसान मिर्च की खेती करते हैं। हमारे दादा-परदादा भी मिर्च उगाया करते थे। मसोटिया की मिर्च की खास डिमांड है। यहां की मिर्च का स्वाद भी अलग है। कुछ ज्यादा तीखा। उन्होंने बताया- नर्सरी में एक महीने में पौधा तैयार हो जाता है। नर्सरी से खेत में पौधा लगाया जाता है तो दो कतारों के बीच 75 सेमी की दूरी रखी जाती है। पौधे से पौधे की दूरी 45 सेमी के करीब रखते हैं। पौधे को 2 सेमी गहरा बोया जाता है। खेत में पौधा लगाने के दो से ढाई महीने में मिर्च लगना शुरू हो जाती हैं। एक महीने में 2 बार मिर्च की तुड़ाई होती है। पौधा जब अच्छी ग्रोथ कर लेता है तो 7-8 महीने तक मिर्च का उत्पादन देता है। प्रति बीघा 40 हजार रुपए लागत मसोटिया गांव के किसान वालेंग ने बताया- इस समय (दिसंबर) सीजन पीक पर है। ऐसे में तुड़ाई के लिए मजदूर रखने पड़ते हैं। प्रति किलो मिर्च की तुड़ाई पर 10 रुपए देते हैं। इसके अलावा खाद-बीज, सिंचाई, निराई-गुड़ाई व थैलियों में भरकर सब्जी मंडी तक पहुंचाने का किराया आदि सब मिलाकर प्रति बीघा लगभग 40 हजार रुपए खर्च हो जाते हैं। यह खेती 6 महीने तक चलती है। एक बार की लागत के बाद जैसे-जैसे तुड़ाई होती है वैसे-वैसे कैश में मुनाफा मिलता है। प्रति किसान प्रति बीघा सीजन में एक से दो लाख मुनाफा कर ही लेता है। कृषि अधिकारी बोले- आस-पास के गांवों के किसान भी हुए प्रेरित मसोटिया के कृषि पर्यवेक्षक व सहायक कृषि अधिकारी पंकज चरपोटा ने बताया- इलाके के किसान परंपरागत ढंग से पीढ़ी दर पीढ़ी मिर्च की खेती करते हैं। इससे किसानों को अच्छी आमदनी हो रही है। अब अन्य गांवों के किसान भी मिर्च की खेती करने में रुचि लेने लगे हैं। मिर्च की खेती के लिए यहां की रेतीली-काली मिट्टी उपयुक्त है। यहां की जलवायु भी आर्द्र है। सर्दियों में पाला न पड़े तो बंपर उत्पादन होता है। तापमान भी 40 के ऊपर नहीं जाना चाहिए। वरना पौधे से मिर्च गिरने लगती हैं। मसोटिया गांव की मिर्च की खास बात यह है कि पैक होने के 21 दिन तक यह मिर्च खराब नहीं होती। आचार के लिए इनका काफी यूज होता है। कंटेंट सहयोग- संजय पटेल, बड़लिया।
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