लुधियाना के पायल में 190 साल से नहीं जलता रावण:प्रतिमा पर चढ़ाते हैं शराब, बकरे के रक्त से सांकेतिक बलि

विजयादशमी पर जहां पूरे देश में रावण दहन होता है। वहीं पंजाब के लुधियाना जिले के पायल शहर में रावण की विधिवत पूजा की जाती है। 1835 से चली आ रही यह 190 साल पुरानी परंपरा पायल के दशहरा मेले और रामलीला को देशभर में एक अलग पहचान देती है। इस 190 साल पुरानी परंपरा को दुबे बिरादरी निभाती आ रही है। दुबे परिवार के सदस्य, जो देश-विदेश में रहते हैं, इस अवसर पर पायल आकर रामलीला और रावण पूजा सहित सभी धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेते हैं। परिवार के सदस्य अखिल प्रकाश दुबे के अनुसार, उनके पूर्वजों ने 1835 में मंदिर का निर्माण कराया था और तब से उनकी आठ पीढ़ियां यहां सेवा कर रही हैं। पायल में सीमेंट से बनी है रावण की प्रतिमा पायल में 1835 से 25 फीट ऊंची रावण की सीमेंट से बनी प्रतिमा स्थापित है। मंदिर परिसर में भगवान श्रीराम, लक्ष्मण, माता सीता और हनुमान जी की मूर्तियों के साथ रावण की प्रतिमा की भी पूजा होती है। यहां श्रद्धालु राम और रावण दोनों की आराधना करते हैं। दशहरा पर दूर-दराज से भक्त इस पूजा में शामिल होने आते हैं। रावण की प्रतिमा को चढ़ाई जाती है शराब स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, दशहरा पर रावण की प्रतिमा को शराब चढ़ाई जाती है। इसके अतिरिक्त, बकरे की सांकेतिक बलि देकर उसके रक्त से रावण का तिलक किया जाता है। इस प्रक्रिया में बकरे के कान पर एक छोटा कट लगाकर रक्त अर्पित किया जाता है। भक्तों का मानना है कि इस पूजा का विशेष महत्व है। ऐसी मान्यता है कि जिन दंपत्तियों को संतान नहीं होती, वे यहां आकर मन्नत मांगते हैं और उनकी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।

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