नागौर में जिला स्टेडियम में दशहरा महोत्सव मनाया गया। स्टेडियम में रावण-कुंभकर्ण-मेघनाद का पुतला जलाया गया। रावण दहन के आधा घंटे बाद भी रावण के पुतले का ढांचा खड़ा रहा। इसके बाद नगर परिषद के कार्मिकों ने रस्सी से खींचकर पुतले को गिराया। नागौर जिला स्टेडियम में 40 फीट के रावण तथा 38-38 फीट के कुंभकर्ण-मेघनाद के पुतले का दहन किया गया। दशहरा महोत्सव में जिला कलेक्टर अरूण कुमार पुरोहित, सभापति मीतू बोथरा समेत बड़ी संख्या में शहरवासी मौजूद थे। जिला प्रशासन और नगर परिषद प्रशासन के संयोजन में विजयादशमी का त्योहार गुरुवार को उत्साह के साथ मनाया गया। नगरपरिषद की ओर से जिला खेल स्टेडियम में दशहरा महोत्सव का आयोजन हुआ। इस दौरान रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतलों का दहन करने के साथ रंगीन आतिशबाजी का प्रदर्शन किया गया। रावण दहन से पहले हाथी चौक से जिला स्टेडियम तक भगवान श्रीराम की शोभायात्रा निकाली गई। दशहरा कार्यक्रम में जिला स्टेडियम में नगरपरिषद की ओर से स्वच्छोत्सव प्रदर्शनी लगाई गई। इसमें स्वच्छता पर आधारित चित्र और जागरूकता झांकियां सजाई गईं। स्टूडेंट्स और स्वयंसेवी संस्थाओं ने भक्तिपूर्ण नृत्य-नाटिका प्रस्तुत की। नगरपरिषद आयुक्त गोविंद सिंह भींचर ने बताया कि प्रदर्शनी का उद्देश्य नागरिकों को स्वच्छता के प्रति जागरूक करना है। हाथी चौक से रवाना हुई शोभायात्रा रावण दहन से पहले शहर में भगवान श्रीराम की शोभायात्रा निकाली गई। शोभायात्रा हाथी चौक से रवाना होकर प्रमुख मार्गों से होती हुई स्टेडियम पहुंची। इसमें विभिन्न सामाजिक संगठनों, विद्यालयों की झांकियों के साथ बैंड भी शामिल रहा। स्टेडियम में भगवान श्रीराम की आरती की गई। इसके बाद सबसे पहले दशानन रावण उसके बाद कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले का दहन किया गया। रावण दहन के बाद करीब आधे घंटे तक आतिशबाजी हुई। नगरपरिषद ने इस बार 40 फीट ऊंचे रावण और 38-38 फीट ऊंचे कुंभकर्ण व मेघनाद के पुतले तैयार कराए। जिला स्टेडियम में रावण दहन देखने के लिए हजारों लोग उमड़े। नागौर में रावण दहन के बावजूद पुतले का ढांचा खड़ा रहा तो लोग हूटिंग करने लगे। बैंड-बाजों के साथ भगवान श्रीराम की शोभायात्रा शहर के मुख्य मार्गों से होते हुए जिला स्टेडियम पहुंची। भगवान श्रीराम दरबार का पूजन और रावण की पूजा-अर्चना के बाद दहन किया गया। आतिशबाजी के साथ पुतलों का दहन देख लोग उत्साह से झूम उठे। इस दशहरे पर भद्रा और पंचक का साया नहीं था। 51 साल बाद रवि योग, धृति योग और सुकर्मा योग का संयोग बना, जो शुभ कार्यों की शुरुआत, सिद्धि, लाभ, स्थिरता और दृढ़ता का प्रतीक रहा। इस संयोग ने उत्सव की रौनक को और बढ़ा दिया।


