सबसे आम उपयोग की जाने वाली सर्दी-खांसी की दवा में तीन प्रकार की दवाएं होती हैं: क्लोरफेनिरामाइन, फेनाइलेफ्रीन और डेक्स्ट्रोमेथोरफेन। तीनों दवाओं के प्रभाव और दुष्प्रभाव होते हैं। यदि बहुत अधिक आवश्यकता नहीं है, तो बच्चों को जबरन दवाएं न दें। यदि आवश्यकता हो, तो दवाएं कम समय के लिए लिखी जाएं। डॉक्टर्स की जिम्मेदारी है कि कम समय के लिए कम डोज में दवा लिखें।
यदि बच्चे को लिखी गई दवाओं से फायदा नहीं हो रहा है, तो परिजन की जिम्मेदारी है कि वे दोबारा डॉक्टर्स के पास जाएं। डॉक्टर को बच्चे की बीमारी से संबंधित जरूरी जांच करानी चाहिए, ताकि बीमारी को समय पर पकड़ा जा सके। लेकिन ऐसा नहीं होना चाहिए कि डॉक्टर एक दिन में तीन बार आठ दिन के लिए दवाएं लिख दें। इससे बच्चे की सेहत को नुकसान हो सकता है। कफ सिरप बच्चों और वयस्कों के लिए एक ही तरह का आता है। इसलिए डॉक्टर्स की जिम्मेदारी है कि बच्चों के लिए सिरप हाफ स्ट्रेंथ वाला हो, जबकि वयस्क के लिए फुल स्ट्रेंथ का सिरप इस्तेमाल हो। कई बार दोनों दवाओं के नाम एक जैसे होते हैं। इसलिए डॉक्टर और केमिस्ट को सटीक तरीके से यह सुनिश्चित करना चाहिए कि जो दवा लिखी गई है, वही दी जा रही है। डॉक्टरों की जिम्मेदारी है कि माता-पिता को यह समझाएं कि यदि बच्चा छोटा है, तो उसे सटीक डोज (एमएल में) कैसे दी जाए। इसके लिए डॉक्टरों को परिजन को जागरूक करने के लिए काउंसलर की व्यवस्था भी करनी चाहिए। क्योंकि बात उस मासूम की हो रही है, जिसे खुद भी नहीं पता कि उसे जो दवा दी जा रही है, वह क्यों दी जा रही है। मैं स्वयं जब बच्चे के लिए कोई दवा लिखता हूं, तो तीन स्तर पर परिजन को इसे समझाने का इंतजाम करता हूं। पहला, मेरे केबिन में बैठी नर्स दवा की डोज कैलकुलेट कर परिजन को बताती है। दूसरा, बाहर निकलते समय दूसरी नर्स दवाओं को लेने का तरीका समझाती है। तीसरा, जब परिजन मेडिकल से दवा लेकर आते हैं, तो नर्सें पर्चे के आधार पर दवा के डोज लेने का तरीका समझाती हैं। यदि हम इतने स्तर पर चेक कर लें, तो शायद मासूम की बीमारी समय पर ठीक हो सकती है। 80% परिजन डॉक्टर्स का पर्चा नहीं पढ़ पाते हैं, इसलिए पर्चा सरल भाषा में हो हमारे यहां पर बहुत बड़ा गैप है कि जो डॉक्टर्स दवा लिखता है, उसे समझाने वाला कोई नहीं होता है। जितनी छोटी जगह पर आप जाएंगे, उतना छोटा डॉक्टर होगा, वह पर्चे पर दवा लिख देगा। उसे तत्काल आगे बढ़ा देगा। यह भी समझना चाहिए कि 70 फीसदी से ज्यादा मां-बाप को उस भाषा में डॉक्टर्स पर्चा लिखकर देते हैं, जिस भाषा को वे पढ़ भी नहीं पाते हैं। उनकी हैंडराइटिंग भी ऐसे लिखकर देते हैं कि उसे समझना बहुत मुश्किल काम होता है। 80 फीसदी परिजन ऐसे हैं जो डॉक्टर्स का पर्चा नहीं पढ़ पाते हैं। उसमें लिखी दवाओं के बारे में नहीं जानते हैं। इसलिए डॉक्टर्स की जिम्मेदारी है कि साफ-सुथरी हैंडराइटिंग में पर्चों में दवाओं को लिखकर दें, ताकि उसे पढ़ने में आसानी हो। दवाओं का सटीक कैलकुलेशन कर परिजन को जानकारी दें, ताकि इलाज में परेशानी न हो।


