जालोर में इस बार रावण दहन परंपरा से अलग रहा। नगर परिषद और ठेकेदार की लापरवाही के कारण पुतले अधूरे तैयार हुए और दहन के बाद भी रावण पूरी तरह नहीं जला। नतीजतन, वह जमीन पर गिरा ही नहीं और इस बार मानसून का शगुन भी नहीं मिल पाया। पुतले देर से पहुंचे, अधूरे खड़े किए गए रावण, कुंभकर्ण और मेघनाथ के पुतले दहन से लगभग 24 घंटे देरी से जालोर लाए गए। समय पर मॉनिटरिंग नहीं होने से रावण दहन के वक्त भी पुतले पूरी तरह तैयार नहीं थे। जल्दबाजी में पुतलों के पैर तक नहीं लगाए गए और घास भी नहीं भरी गई। लेकिन इसकी मोनेटरिंग नहीं करने से रावण दहन का समय होने के बाद भी 6.30 बजे तक तैयार नहीं हो सका जिससे सुन्देलाव तालाब स्थित चामुंडा माता से आने वाली राम सेना को भी करीब 30 मिनट तक रोकना पड़ा था। जिसके बाद राम सेना व चामुंडा माता चौक से रवाना हो गई। तो जल्दी में नगर परिषद व ठेकेदार के कार्मिकों ने जल्दी में रावण समेत अन्य पुतले भी ऐसे ही खड्डे कर दिए। और रावण समेत सभी पुतलों के पैर लगाना व रावण में घास लगाना भी भूल गए। जिससे रावण में पुरी तरह आग नहीं पकड़ा और ना ही रावण जला। जिससे रावण नीचे नहीं गिरा जिससे जालोर में आगामी मानसून को लेकर कोई सगुन नहीं मिले। रावण पूरी तरह नहीं जला शाम को पेट्रोल डालकर आग लगाने के बाद भी रावण ने पूरी तरह आग नहीं पकड़ी। दहन अधूरा रहा और पुतले गिर नहीं पाए। बाद में नगर परिषद ने रावण के अधजले अवशेष स्टेडियम के पीछे कचरे में डाल दिए। बता दें कि राजस्थान में मान्यता है कि रावण जिस दिशा में गिरता है, उस दिशा में अकाल पड़ता है और अन्य दिशाओं में अच्छे मानसून की संभावना रहती है। इस बार रावण प्राकृतिक रूप से गिरा ही नहीं, इसलिए शगुन अधूरा रह गया। पंडित अंबालाल व्यास ने बताया – रावण का सिर उत्तर-पश्चिम की ओर झुका था, जिससे अच्छे मानसून की संभावना जताई जा सकती है। हालांकि यह झुकाव प्राकृतिक दहन से नहीं, बल्कि पहले से ही था, इसलिए यह सशंकित संकेत माना जा रहा है।


