देवास रोड स्थित शासकीय माधव साइंस कॉलेज में वर्मी कंपोस्ट प्लांट बनाकर यहाँ अब विद्यार्थियों को खाद बनाने की विधि सिखाई जा रही है। दो महीनों में कॉलेज के 100 विद्यार्थियों को खाद बनाने की ट्रेनिंग दी गई है। खास बात यह है कि शहर सहित प्रदेश के अन्य कॉलेज और स्कूलों के विद्यार्थी भी यहाँ आकर नि:शुल्क खाद बनाने का प्रशिक्षण ले सकते हैं। माधव साइंस कॉलेज परिसर में वनस्पति उद्यान में स्थाई रूप से वर्मी कंपोस्ट प्लांट का निर्माण किया गया था। इस प्लांट में 10 अलग-अलग सेक्शन हैं। मंदिरों से निकलने वाले फूल, गोबर और अन्य विघटित होने वाले उत्सर्जित पदार्थ का मिश्रण यहाँ किया जाता है। प्राचार्य डॉ. हरीश व्यास ने बताया इस मिश्रण में केंचुए की विशेष प्रजाति आइसनिया फेटिडा का उपयोग ऑर्गेनिक खाद बनाने में किया जाता है। इसलिए इसे वर्मी कंपोस्ट कहा जाता है। यह प्रक्रिया भारतीय ज्ञान परंपरा का एक महत्वपूर्ण भाग है, क्योंकि केंचुए नम मिट्टी का महत्वपूर्ण भाग होते हैं और वे जटिल पदार्थों को सरल कार्बनिक में बदल देते हैं, जिसे ऑर्गेनिक खाद कहा जाता है। कॉलेज में इस प्लांट की शुरुआत इसी वर्ष 15 जुलाई से की गई है। पहले चरण में बीएससी एग्रीकल्चर के 100 विद्यार्थियों को यहाँ खाद बनाने का प्रशिक्षण दिया गया। शहर में यह पहला शासकीय कॉलेज है, जहाँ वर्मी कंपोस्ट प्लांट बनाकर विद्यार्थियों को खाद बनाने का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। इस प्लांट के को-ऑर्डिनेटर डॉ. अनिल पांडे एवं केयर टेकर स्वदेश शिशुलकर हैं। डॉ. व्यास ने बताया वर्तमान सत्र के अंत तक 400 से अधिक को प्रशिक्षण देने का लक्ष्य है, ताकि समाज ऑर्गेनिक उत्पादों के प्रति सजग हों। शहर सहित प्रदेश के अन्य कॉलेज और स्कूल के विद्यार्थी भी यहाँ आकर नि:शुल्क खाद बनाने का प्रशिक्षण लेकर कार्य कर सकते हैं। शनिवार को एसजीएसआईटीएस, इंदौर के डायरेक्टर प्रो. नीतेश पुरोहित ने भी प्लांट का निरीक्षण कर यहाँ खाद बनाने की विधि की जानकारी ली। प्रो. पुरोहित ने बताया इसी तरह की शुरुआत वे एसजीएसआईटीएस में भी करने का प्रयास करेंगे। पैकेट बनाकर अतिथियों को दी जाती है खाद कॉलेज प्राचार्य डॉ. व्यास ने बताया वर्मी कंपोस्ट प्लांट में खाद बनाने के लिए सबसे पहले गोबर, मंदिर से निकले फूल व कॉलेज के वनस्पति उद्यान से निकले पत्तों का एकत्रीकरण किया जाता है। इसके बाद केंचुए की विशेष प्रजाति का संधारण कर एकत्रित किए गए फूल, गोबर जैसे उत्सर्जी पदार्थों को मिलाकर उचित नमी के साथ केंचुए छोड़े जाते हैं। 8 से 10 दिन तक इसमें उचित नमी बनाए रखना होती है। इसके बाद खाद बनने पर खाद से केंचुओं को अलग किया जाता है। बाद में खाद को सूखा कर पाउडर के रूप में परिवर्तित कर लिया जाता है। कॉलेज में होने वाले विभिन्न कार्यक्रमों और संगोष्ठियों में अतिथियों को प्लांट में बनाई खाद के पैकेट दिए जाते हैं। गांव से जुड़े हैं इसलिए शुरू किया प्रशिक्षण डॉ. व्यास ने बताया खाद बनाने की प्रक्रिया भारतीय ज्ञान परंपरा का एक महत्वपूर्ण भाग है। ग्रामीण इलाकों में घर के पास रोड़ी बनाई जाती है, जहाँ बचा हुआ खाना और गोबर डाला जाता है। इसी रोड़ी में कंपोस्टिंग खाद बनती है। इस खाद को आज भी कई ग्रामीण इलाकों में अन्न प्रदाता माना जाता है। डॉ. व्यास ने बताया मैं स्वयं ग्रामीण इलाके से हूँ। इसलिए कॉलेज में नई पीढ़ी के विद्यार्थियों को इस अन्न प्रदाता खाद को बनाने का प्रशिक्षण देने की शुरुआत की।


