होटलों में खाने की बढ़ती प्रवृत्ति खतरनाक साबित हो सकती है। हाल के वर्षों में बाहर खाने की प्रवृत्ति बढ़ी है और यह प्रवृत्ति अच्छी नहीं है। रांची में प्रवास कर रहे जैन मुनि सुतीर्थ सागर महाराज ने यह विचार धर्म सभा में व्यक्त किए। दिगम्बर जैन संत आचार्य 108 सूर| सागर महाराज के प्रभावक शिष्य 108 श्री सुतीर्थ सागर महाराज ने शनिवार को होटलों में खाने को लेकर काफी आलोचना की और कहा कि इससे हमारा मन अशुद्ध होता है, क्योंकि अगर खान-पान अशुद्ध होगा, तो हमारे मन पर प्रभाव भी डालेगा। मुनिश्री ने अपने गृहस्थ जीवन की चर्चा करते हुए कहा कि किस तरह उनका जीवन वैराग्य की ओर मुड़ गया। उन्होंने जीवन शैली को जीने का ढंग बताया। श्री दिगंबर जैन मंदिर में प्रातः मंगलाचरण के बाद मुनिश्री ने बताया कि कैसे बच्चों का भविष्य स्वर्णिम धर्म के माध्यम से बनाया जा सकता है। इसके लिए लोगों को प्रारंभ से ही बच्चों को संस्कार देना चाहिए। विवाह के समय भी उन्होंने जोर दिया कि चक्रवती पद्धति से विवाह किया जाना चाहिए क्योंकि चक्रवती विवाह में ही दिन में विवाह होता है और पूरे विधि-विधान के साथ विवाह की प्रक्रिया पूरी की जाती है।


