कोटपूतली के कीरतपुरा गांव की ढाणी बड़ियाली के एक खेत के बोरवेल में 10 दिन पहले गिरी 3 साल की मासूम चेतना नहीं रही। बुधवार को सूखे बोरवेल में प्राण डूब गए। 23 दिसंबर को खेत में सूखे बोरवेल की पाइप दोबारा इस्तेमाल के लिए निकाल ली गई थी। दो घंटे बाद ही चेतना खेलते हुए 700 फीट गहरे बोरवेल में गिर गई। चेतना को 10वें दिन बुधवार शाम 6:25 बजे निकाला गया। गौरतलब है कि बच्ची को बोरवेल से बाहर निकालने के लिए 200 घंटे से ज्यादा का रेस्क्यू ऑपरेशन चलाया गया। कड़ी चुनौतियों के बीच 700 फीट गहरे बोरवेल में 150 फीट गहराई में फंसी बच्ची तक पहुंचा जा सका। एनडीआरएफ के प्रभारी योगेश मीणा ने बताया कि बच्ची मिट्टी में फंसी हुई थी। जब उसे निकाला, तब शरीर में कोई मूवमेंट नहीं था। एनडीआरएफ के जवान महावीर सफेद कपड़े में लपेटकर चेतना को बाहर लेकर आए। देर शाम तक बच्ची का पोस्टमार्टम नहीं हो सका। बोरवेल हादसों में 10 साल में 17 मौतें हो चुकी हैं। इनमें 2024 में तीन मौतें हुई थीं। 2025 में पहली मौत चेतना की हुई है। भास्कर तत्काल – पाइप निकाल कर ड्राई बोरवेल खुले छोड़ दिए जाते हैं, एक खेत में 4-4 खुले मौत के कुएं लालसोट के श्यामपुरा में किसान कच्चे बोरवेल में ही सबमर्सिबल पंप उतार रहे हैं। बोरिंग मशीन से खुदाई के बाद मिट्टी रोकने के लिए जरूरी कंक्रीट का काम भी नहीं कराया। ऐसा कच्चा बोरवेल पक्का खतरा है। पाइप क्यों नहीं लगाए? पूछने पर बोला- एक लाख रुपए खर्च क्यों करें? जयपुर की 100 किमी परिधि के 20 गांवों में भास्कर रिपोर्टर ने हालात परखे। हालात चौंकाने वाले थे। पानी सूखने पर नया बोरवेल खोद दिया जाता है। पुराने से बोरवेल का पाइप निकाल कर वैसे ही खुले छोड़ देते हैं। एक खेत में 4-4 खुले मौत के कुएं दिखे। भास्कर एक्सपर्ट; प्रो. डॉ. के.पी. श्रीधर,रिव्यू ऑफ बोरवेल रेस्क्यू ऑपरेशन के लेखक, कोयम्बटूर, तमिलनाडु अमूमन ऐसे रेस्क्यू ऑपरेशंस में करीब 50 लाख रुपए रोजाना खर्च हाेते हैं। रेस्क्यू स्पॉट पर मशीन पहुंचाने के लिए सड़क तक बनानी पड़ती है। कोटपूतली के रेस्क्यू में भी 2 पाइल मशीन, 2 हाइड्रोलिक मशीन, 3 जेसीबी, 1 क्रेन, 3 एंबुलेंस, 1 बोरिंग मशीन, 1 दमकल, 1 जनरेटर लगाए गए। एसडीआरएफ और एनडीआरएफ के 100 से अधिक जवान लगे थे। 50-50 पुलिसकर्मी 2 शिफ्ट में तैनात थे। भास्कर अपील नए साल पर नव संकल्प ले सरकार सरकार यह करे…3 से 6 महीने में प्रदेशभर के खुले बोरवेल बंद कराने के लिए टाइम लाइन बनाए। जनप्रतिनिधि की जिम्मेदारी… सरपंच, विधायक, सांसद और स्थानीय अधिकारी अपने क्षेत्रों में बोरवेल बंद कराने के लिए मुहिम चलाएं। जरूरत पड़े तो कोष से पैसा खर्च करें। …और आमजन…बोरवेल फेल हो जाता है तो ढकने की व्यवस्था करें। खुला ना छोड़ें। सिर्फ 1000 हजार रु. का ढक्कन किसी मासूम की जिंदगी बचा लेगा।


