छत्तीसगढ़ का कांकेर जिला, जो कभी नक्सल प्रभावित क्षेत्र के रूप में जाना जाता था। अब आधुनिक और उन्नत खेती के लिए पहचान बना रहा है। यहां के किसान धान जैसी पारंपरिक फसलों के साथ-साथ अब लाख की खेती भी कर रहे हैं, जिससे उन्हें अच्छी कमाई हो रही है। लाख उत्पादन के मामले में कांकेर प्रदेश में नंबर वन बन गया है, जहां हर साल लगभग 7 हजार मीट्रिक टन लाख का उत्पादन होता है। पारंपरिक रूप से लाख का उत्पादन कुसुम और बेर के पेड़ों पर किया जाता है। हालांकि, अब किसान ‘सेमियालता मॉडल’ अपनाकर लाख का उत्पादन कर रहे हैं। जिसे एक सफल मॉडल के रूप में विकसित किया गया है। कृषि वैज्ञानिकों और किसानों के अनुसार, सेमियालता के पौधे पर लाख की खेती में शुरुआती लागत के बाद खर्च कम होता जाता है और प्रति एकड़ 1 लाख रुपए तक की आय प्राप्त होती है। कांकेर में देश का सर्वोच्च गुणवत्ता वाला कुसुमी लाख उत्पादन जिला कृषि विज्ञान केंद्र के प्रमुख डॉ. बीरबल साहू ने बताया कि कांकेर में देश का सबसे उच्च गुणवत्ता वाला ‘कुसुमी लाख’ तैयार होता है। लाख के बीज की कमी को दूर करने के लिए सेमियालता में भी उत्पादन शुरू किया गया है। वर्तमान में, लगभग 60-70 एकड़ क्षेत्र में सेमियालता की फसल लगाई गई है। नक्सल प्रभावित क्षेत्र की बदली तस्वीर कभी नक्सल गतिविधियों के कारण सुर्खियों में रहने वाला कांकेर अब लाख उत्पादन के माध्यम से किसानों को आर्थिक रूप से सशक्त कर रहा है और क्षेत्र की छवि बदल रहा है। कांकेर न केवल देश में सबसे उच्च गुणवत्ता वाले लाख का उत्पादन कर रहा है, बल्कि यहां से अब अन्य राज्यों को भी लाख के बीज उपलब्ध कराए जा रहे हैं। लाख खेती से किसानों की आमदनी में बड़ा उछाल किसान पुरुषोत्तम मंडावी ने बताया कि उन्होंने 120 पौधों से लाख की खेती शुरू की थी और आज उनका सालाना टर्नओवर 8 से 10 लाख रुपए है। कांकेर पूरे प्रदेश में सबसे आगे है, जिसके कारण पूरे प्रदेश से लगभग 1200 किसान कांकेर के किसानों से जुड़े हुए हैं और उनके बीच बीज का आदान-प्रदान हो रहा है।


