HC- ‘बिना सुने जांच अधिकारी को षड़यंत्रकारी नहीं बताए लोअर-कोर्ट’:रेप केस में ‘एफआर’ लगाने वाले आरपीएस पर की थी ट्रायल कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी

राजस्थान हाईकोर्ट ने पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों के अधिकारों को लेकर एक नजीर पेश करने वाला फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि किसी जांच अधिकारी द्वारा की गई इन्वेस्टिगेशन से असहमत होने का मतलब यह नहीं है कि अदालत उसे बिना सफाई का मौका दिए ‘लापरवाह’, ‘दुर्भावनापूर्ण’ या ‘षड्यंत्रकारी’ घोषित कर दे। जस्टिस फरजंद अली की एकल पीठ ने जैसलमेर में तैनात एएसपी (तत्कालीन सीओ, बालेसर) राजूराम चौधरी को बड़ी राहत देते हुए निचली अदालतों द्वारा उनके खिलाफ की गई बेहद तल्ख और प्रतिकूल टिप्पणियों को रिकॉर्ड से हटाने का आदेश दिया है। कोर्ट ने माना कि ऐसी टिप्पणियां एक अधिकारी के करियर को बर्बाद कर सकती हैं, इसलिए बिना सुनवाई के ऐसा आदेश देना नैसर्गिक न्याय की हत्या है। क्या था पूरा मामला? मामला तब का है जब याचिकाकर्ता राजूराम चौधरी जोधपुर के बालेसर में वृत्ताधिकारी (सीओ) के पद पर तैनात थे। उनके पास एक महिला द्वारा दर्ज करवाया गया एक रेप केस जांच के लिए आया था। पीड़िता का आरोप था कि आरोपी प्रहलाद राम ने एक अन्य व्यक्ति के साथ मिलकर घर में घुसकर चाकू की नोक पर उसके साथ गैंगरेप किया और अश्लील फोटो वायरल किए। जांच अधिकारी ने अपनी इन्वेस्टिगेशन में पाया कि गैंगरेप के आरोपों की पुष्टि नहीं हो रही है। उन्होंने आरोपी प्रहलाद राम के खिलाफ केवल अश्लील फोटो वायरल करने के मामले में आईटी एक्ट के तहत चालान पेश किया। पुलिस की इस जांच से असंतुष्ट होकर परिवादिया ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। निचली अदालतों की आईओ पर तल्ख टिप्पणियां पुलिस की जांच रिपोर्ट को लेकर निचली अदालतों ने जिस तरह की सख्त टिप्पणियां कीं, वे किसी भी अधिकारी के लिए चिंताजनक थीं। हाईकोर्ट के आदेश में – सेशन कोर्ट, जोधपुर (28 जुलाई 2022): निगरानी याचिका पर सुनवाई करते हुए सेशन जज ने लिखा कि जांच अधिकारी ने साक्ष्यों को गौर से नहीं देखा। कोर्ट ने यहां तक लिखा कि ऐसा लगता है कि “किसी दुर्भावना या षड्यंत्र के चलते गलत धारा में आरोप पत्र प्रस्तुत किया गया।” कोर्ट ने मामले को रिमांड पर भेजते हुए अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई का संकेत दिया। सीजेएम कोर्ट, बालेसर (1 मार्च 2025): जब मामला वापस नीचली कोर्ट में आया, तो सीजेएम कोर्ट ने और भी कड़ा रुख अपनाया। कोर्ट ने आदेश में लिखा कि रेप जैसे संवेदनशील मामले में आरोपी को क्लीन चिट देना “विधि के प्रावधानों की पूर्ण अवहेलना और कर्तव्यों के प्रति घोर लापरवाही का द्योतक है।” बात यहीं खत्म नहीं हुई, कोर्ट ने आदेश दिया कि इस फैसले की एक कॉपी राजस्थान के डीजीपी को भेजी जाए, ताकि वे संबंधित अधिकारी (राजूराम चौधरी) के खिलाफ उचित विभागीय कार्रवाई करें और कोर्ट को बताएं। हाईकोर्ट का तर्क: ‘ऑडी अल्टरम पार्टम’ का उल्लंघन याचिकाकर्ता के वकील ने हाईकोर्ट में तर्क दिया कि निचली अदालतों ने अधिकारी को नोटिस दिए बिना और उनका पक्ष सुने बिना ही उन्हें दोषी करार दे दिया। जस्टिस फरजंद अली की कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार करते हुए विस्तृत व्याख्या दी: अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण: हाईकोर्ट ने कहा कि संज्ञान या रिमांड के स्तर पर कोर्ट का काम सिर्फ यह देखना है कि प्रथम दृष्टया मामला बनता है या नहीं। इस स्तर पर जांच अधिकारी की मंशा पर सवाल उठाना या उन पर ‘षड्यंत्र’ का आरोप लगाना अधिकार क्षेत्र से बाहर है। करियर पर असर: कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की कि न्यायिक आदेशों में की गई ऐसी निंदात्मक टिप्पणियों के गंभीर ‘सिविल और सर्विस परिणाम’ होते हैं। इससे अधिकारी की पदोन्नति, पोस्टिंग और प्रतिष्ठा प्रभावित होती है। सुनवाई जरूरी: ‘ऑडी अल्टरम पार्टम’ यानी ‘दूसरे पक्ष को भी सुनो’ कानून का बुनियादी सिद्धांत है। किसी भी व्यक्ति को उसकी पीठ पीछे दोषी नहीं ठहराया जा सकता। चूंकि निचली अदालतों ने अधिकारी को सफाई का मौका नहीं दिया, इसलिए ये टिप्पणियां कानूनन गलत हैं। फैसला: टिप्पणियां हटीं, लेकिन रेप केस की जांच जारी रहेगी हाईकोर्ट ने अपने फैसले में संतुलन बनाते हुए आदेश दिया है: टिप्पणियां हटाई गईं: 28 जुलाई 2022 और 1 मार्च 2025 के आदेशों से जांच अधिकारी के खिलाफ की गई सभी प्रतिकूल टिप्पणियों (जैसे- लापरवाही, षड्यंत्र, दुर्भावना) को हटाया जाता है। डीजीपी को भेजा निर्देश रद्द: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि डीजीपी को कार्रवाई के लिए भेजा गया निर्देश भी प्रभावी नहीं रहेगा। केस चलता रहेगा: हालांकि, कोर्ट ने यह साफ कर दिया है कि इन टिप्पणियों को हटाने का असर मुख्य आपराधिक मुकदमे पर नहीं पड़ेगा। निचली अदालत द्वारा मामले को रिमांड पर भेजने या दोबारा जांच के जो आदेश दिए गए थे, वे बरकरार रहेंगे और कानून के मुताबिक चलते रहेंगे।

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