उत्तराखंड में गौला नदी के किनारे, काठगोदाम से करीब 10 किलोमीटर दूर पहाड़ियों के बीच एक ऐसा निर्माण कार्य चल रहा है, जिसका इंतजार लोग पिछले 48 साल से कर रहे हैं। पीएम नरेंद्र मोदी की घोषणा में शामिल यह परियोजना अब जमीन पर आकार लेने लगी है और उत्तराखंड–उत्तर प्रदेश के लाखों लोगों को पानी उपलब्ध कराने की दिशा में निर्णायक चरण में पहुंच चुकी है। जमरानी बांध परियोजना, जिसका शिलान्यास 1976 में हुआ था। करीब ₹3,808 करोड़ की लागत से बन रहा यह बहुउद्देशीय बांध न केवल उत्तराखंड के नैनीताल और उधम सिंह नगर जिले के पेयजल संकट को दूर करेगा, बल्कि सीमावर्ती उत्तर प्रदेश के बरेली, रामपुर और पीलीभीत के किसानों को भी सिंचाई का स्थायी समाधान देगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की घोषणा में शामिल इस परियोजना का निर्माण कार्य तेज गति से चल रहा है और इसे जुलाई 2029 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। दैनिक भास्कर की टीम जब ग्राउंड जीरों पर पहुंची तो जमरानी गांव के पास पहुंचते ही पहाड़ों के बीच मशीनों की आवाज और काम में जुटे मजदूरों की हलचल दिखी। जो इस बात का संकेत देती है कि दशकों से अटकी परियोजना अब वास्तविकता बनने की दिशा में आगे बढ़ चुकी है। निर्माण स्थल पर बड़े पैमाने पर कटिंग, सुरंग निर्माण और संरचनात्मक कार्य चल रहा है। इंजीनियरों के अनुसार, बांध को इस तरह डिजाइन किया जा रहा है कि वह भूकंप और आपदा जैसी परिस्थितियों में भी सुरक्षित रहे। 1976 में शिलान्यास, 2025 में आई तेजी जमरानी बांध का शिलान्यास 26 फरवरी 1976 को तत्कालीन केंद्रीय ऊर्जा मंत्री केसी पंत और उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी ने किया था। लेकिन बजट, पर्यावरणीय मंजूरी और तकनीकी कारणों से यह परियोजना दशकों तक कागजों में ही रही।
राज्य स्थापना दिवस 9 नवंबर 2025 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देहरादून से इसका पुनः शिलान्यास किया, जिसके बाद निर्माण कार्य ने गति पकड़ी। 10.5 लाख लोगों की प्यास बुझाएगा बांध परियोजना पूरी होने के बाद हल्द्वानी और आसपास के क्षेत्रों की करीब 10.5 लाख आबादी को 117 एमएलडी पेयजल उपलब्ध होगा। आज हल्द्वानी और तराई क्षेत्र की बढ़ती आबादी के कारण पेयजल संकट लगातार बढ़ रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह बांध आने वाले कई दशकों तक क्षेत्र की जल जरूरतों को पूरा करेगा। कृषि उत्पादन के साथ आय भी बढ़ेगी जमरानी बांध बनने से करीब 57 हजार हेक्टेयर अतिरिक्त भूमि की सिंचाई संभव होगी। इसका फायदा उत्तराखंड के साथ-साथ उत्तर प्रदेश के बरेली, रामपुर और पीलीभीत जिलों के किसानों को मिलेगा। इससे कृषि उत्पादन बढ़ेगा और किसानों की आय में सुधार की उम्मीद है। 50 साल में 50 गुना बढ़ गई लागत इस परियोजना की लागत पिछले 50 वर्षों में करीब 50 गुना बढ़ गई है। वर्ष 1975 में इसकी अनुमानित लागत ₹61.25 करोड़ तय की गई थी, लेकिन समय के साथ निर्माण में लगातार देरी, बढ़ती महंगाई और तकनीकी बदलावों के कारण लागत में भारी वृद्धि हुई। अब संशोधित लागत बढ़कर ₹3,808 करोड़ तक पहुंच गई है, जो शुरुआती अनुमान से कई गुना अधिक है। तकनीकी रूप से मजबूत बन रहा बांध परियोजना के तहत बांध को तकनीकी रूप से अत्याधुनिक और सुरक्षित बनाया जा रहा है। बांध की ऊंचाई 150.6 मीटर निर्धारित की गई है, जबकि इससे बनने वाली झील की लंबाई करीब 10 किलोमीटर होगी। सिंचाई और जल प्रबंधन को बेहतर बनाने के लिए 21.25 किलोमीटर लंबी नई नहर बनाई जा रही है, साथ ही 42.92 किलोमीटर पुरानी नहर का पुनर्निर्माण भी किया जा रहा है। परियोजना में 600 मीटर और 644 मीटर लंबाई की दो टनल भी शामिल हैं। सिलक्यारा टनल हादसे से सबक लेते हुए यहां सुरक्षा के विशेष इंतजाम किए गए हैं। मजदूरों की सुरक्षित निकासी के लिए अतिरिक्त पाइप लगाए गए हैं। बिजली उत्पादन फिलहाल नहीं होगा परियोजना में 14 मेगावाट बिजली उत्पादन का प्रस्ताव था, लेकिन टाइगर कॉरिडोर क्षेत्र होने के कारण केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने इसकी अनुमति नहीं दी। हालांकि, अधिकारियों का कहना है कि भविष्य में इसके लिए फिर से अनुमति मांगी जाएगी। पर्यटन और रोजगार के नए अवसर बांध बनने से यहां 10 किलोमीटर लंबी झील विकसित होगी, जो नया पर्यटन केंद्र बन सकती है। स्थानीय लोगों को उम्मीद है कि इससे क्षेत्र में रोजगार के अवसर बढ़ेंगे और स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी। 90% खर्च केंद्र सरकार उठा रही यह परियोजना प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY) के तहत तैयार की जा रही है। योजना की लागत का 90% हिस्सा केंद्र सरकार वहन कर रही है, जबकि शेष 10% खर्च उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश सरकार मिलकर उठाएंगी। जमरानी बांध परियोजना के प्रबंधक एमके खरे के अनुसार, परियोजना का निर्माण कार्य तेजी से चल रहा है। इसके पूरा होने से तराई-भाबर और कुमाऊं के साथ उत्तर प्रदेश के सीमावर्ती जिलों की पेयजल और सिंचाई समस्या का स्थायी समाधान होगा। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी भी परियोजना का निरीक्षण कर चुके हैं और निर्माण कार्य को प्राथमिकता देने के निर्देश दिए हैं। क्यों महत्वपूर्ण है जमरानी बांध जमरानी बांध कुमाऊं क्षेत्र के लिए बहुप्रतीक्षित परियोजना मानी जा रही है। यह बांध आने वाले वर्षों में कुमाऊं के शहरों के लिए पेयजल आपूर्ति को सुरक्षित करने में अहम भूमिका निभाएगा, जिससे बढ़ती आबादी और जल संकट की समस्या को नियंत्रित किया जा सकेगा। साथ ही यह परियोजना उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश के किसानों को सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराएगी, जिससे कृषि उत्पादन में वृद्धि होगी और किसानों की आय मजबूत होगी। जमरानी बांध पर्यटन को भी बढ़ावा देगा। जलाशय और आसपास का क्षेत्र नए पर्यटन स्थल के रूप में विकसित हो सकता है, जिससे स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर सृजित होंगे। इसके अलावा, तराई- क्षेत्र में लंबे समय से बनी जल संकट की समस्या का यह स्थायी समाधान साबित हो सकता है, क्योंकि नियंत्रित जल प्रबंधन से पूरे इलाके को नियमित और संतुलित जल आपूर्ति सुनिश्चित की जा सकेगी। ———————— ये खबर भी पढ़ें : उत्तराखंड बजट- 11 मार्च को पेश करेंगे CM धामी: 2027 चुनाव से पहले आखिरी पूर्ण बजट, गैरसैंण में 9 मार्च से शुरू होगा सत्र उत्तराखंड विधानसभा का बजट सत्र 9 से 13 मार्च तक ग्रीष्मकालीन राजधानी गैरसैंण (भराड़ीसैण) में आयोजित होगा और 11 मार्च को मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी राज्य का बजट पेश करेंगे। 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले यह धामी सरकार का आखिरी पूर्ण बजट होगा, इसलिए इसे सरकार के ‘आर्थिक रोडमैप’ और चुनावी दिशा तय करने वाले अहम दस्तावेज के रूप में देखा जा रहा है। अधिसूचना जारी कर दी गई है। (पढ़ें पूरी खबर)


