अटेर किले की तलहटी में ऊंट सफारी शुरू:चंबल में गोवा जैसा फील, 200 रुपए में रेत पर सवारी, 500 में बीहड़ और मंदिर के दर्शन

सदियों तक बीहड़ों और दस्यु (डकैत) कथाओं के लिए पहचानी जाने वाली चंबल अब पर्यटन की नई इबारत लिख रही है। भिंड जिले के अटेर किले की तलहटी में बहती चंबल नदी इन दिनों पर्यटकों को गोवा के समुद्र तट जैसा अहसास करा रही है। भुरभुरी रेत, खुला आसमान और राजस्थानी ऊंट की सवारी का यह नजारा पर्यटकों को खासा लुभा रहा है। वन विभाग ने अटेर में चंबल नदी किनारे ऊंट सफारी की शुरुआत कर दी है। शुरुआत में स्थानीय लोगों के 11 ऊंट सफारी में शामिल किए गए हैं। 200 और 500 रुपए के दो पैकेज ऑफलाइन मिलेंगे टिकट, शाम 4 बजे तक का समय फिलहाल सफारी का समय सुबह 11 बजे से शाम 4 बजे तक निर्धारित है। इसके टिकट अटेर कस्बे के बाहर बने वन विभाग कार्यालय से ऑफलाइन खरीदे जा सकते हैं। दाल-बाटी और कैंपिंग का भी मिलेगा मजा वन विभाग पर्यटकों को लुभाने के लिए लोकल फूड पर आधारित रेस्टोरेंट शुरू करने की तैयारी में है। यहां पर्यटक दाल-बाटी-चूरमा, लड्डू, गट्टे की सब्जी, कढ़ी-पकौड़ी और बेड़ई-सब्जी जैसे पारंपरिक व्यंजनों का स्वाद ले सकेंगे। इसके अलावा, ऋषिकेश की तर्ज पर चंबल किनारे कैंपिंग और भविष्य में बोटिंग सुविधा विकसित करने की योजना पर भी काम चल रहा है। ट्रांसपोर्ट बड़ी चुनौती, शाम 4 बजे के बाद बस नहीं पर्यटन की राह में सबसे बड़ी बाधा आवागमन है। भिंड से अटेर की दूरी करीब 25 किलोमीटर है, लेकिन शाम 4 बजे के बाद अटेर के लिए कोई पब्लिक ट्रांसपोर्ट नहीं मिलता। यदि प्रशासन इस ओर ध्यान दे, तो पर्यटन और तेजी से बढ़ सकता है। रेंजर बोलीं- स्थानीय लोगों को मिलेगा रोजगार वन विभाग की रेंजर कृतिका शुक्ला ने बताया कि इस पहल का उद्देश्य सिर्फ पर्यटन बढ़ाना नहीं, बल्कि स्थानीय लोगों को रोजगार देना भी है। इको-टूरिज्म के जरिए संरक्षण और विकास का संतुलन बनाया जा रहा है।

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