मप्र हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी महिला की तस्वीर लेना अपने आप में अपराध नहीं है। अपराध तभी बनेगा जब फोटो गरिमा को ठेस पहुंचाने, निजता में दखल देने या बदनाम करने की मंशा से ली गई हो। इसी आधार पर जस्टिस हिमांशु जोशी की एकलपीठ ने रीवा के अधिवक्ता पर दर्ज केस निरस्त कर दिया। याचिकाकर्ता अधिवक्ता सुभाष तिवारी की ओर से अधिवक्ता निखिल भट्ट ने कोर्ट में पक्ष रखा। उन्होंने बताया कि रीवा के सोहागी थाने में एफआईआर दर्ज की गई थी, जिसे निरस्त करने की मांग की गई। शिकायतकर्ता महिला का आरोप था कि वह बाजार में दोस्तों के साथ जूस पी रही थी, तभी अधिवक्ता ने उसकी फोटो खींच ली। बदनाम करने की धमकी दी। कोर्ट के सामने यह भी आया कि घटना के 5 माह बाद केस दर्ज कराया गया है। पेशेगत शत्रुता का पहलू भी , इसलिए केस निरस्त
कोर्ट को बताया कि याचिकाकर्ता महिला के परिजन से जुड़े एक मामले में विपक्ष की ओर से पैरवी कर रहा था। ऐसे में यह मामला पेशेगत विवाद और शत्रुता से भी जुड़ा हो सकता है। कोर्ट ने कहा कि केस में महिला की प्राइवेसी में हस्तक्षेप या आपराधिक मंशा के ठोस आधार नहीं हैं।


