अनूपपुर जिले के ग्राम देवरी में विजयदशमी के दिन रावण की पूजा की जाती है। यहाँ के कुछ आदिवासी परिवार रावण को अपना देवता मानते हुए विधि-विधान से उसकी पूजा-अर्चना करते हैं। यह परंपरा बीते छह वर्षों से फिर से शुरू की गई है, जो पहले कुछ समय के लिए बंद हो गई थी। ग्राम देवरी के लोगों के अनुसार, रावण की माता कैकसी असुर कुल से थीं और दैत्यराज सुमाली की पुत्री थीं। आदिवासी परिवार उन्हें अपने कुल और वंश की बहन व माता मानते हैं। इस नाते, रावण को वे अपना पुत्र और उच्च ब्राह्मण कुल के साथ-साथ अपना राजा भी मानते हैं। मान्यता है कि रावण की माता कैकसी ने महर्षि विश्रवा से विवाह किया था, जो ऋषि पुलस्त्य के पुत्र थे। इसी विवाह से रावण, कुंभकर्ण, शूर्पणखा और विभीषण का जन्म हुआ था। इन आदिवासी परिवारों का मूल मकसद समाज, संस्कृति और रावण के ‘जियो और जीने दो’ के सिद्धांत को जीवित रखना है। उनका कहना है कि उनके समाज का मूल मंत्र रावण के सिद्धांतों पर आधारित है। इसी कारण, वे रावण को पूजनीय मानते हुए हर विजयदशमी पर उत्सव के तौर पर उसकी पूजा करते हैं, न कि उसका दहन। यह अनूठी परंपरा इस आदिवासी अंचल की पहचान बन गई है।


