छत्तीसगढ़ में विंड्स योजना में सुस्ती का आलम ये है कि 6 माह में ग्राम पंचायतों और राजस्व निरीक्षक मंडलों में मौसम स्टेशन के लिए स्थल चयन नहीं हो सका है। ऐसे में इस योजना के तहत फसल बीमा का लाभ मिलना मुश्किल है। हालांकि योजना के अंतर्गत ठेके की प्रक्रिया पूरी की जा चुकी है। केंद्र की विंड्स (वेदर इनफॉर्मेशन एंड नेटवर्क डेटा सिस्टम) के अंतर्गत छत्तीसगढ़ के सभी 11623 ग्राम पंचायतों में ऑटोमेटिक रेन गेज (एआरजी) और सभी 730 राजस्व निरीक्षक मंडलों में ऑटोमेटिक वेदर स्टेशन (एडब्ल्यूएस) स्थापित होने हैं। ऐसा इसलिए किया जा रहा है, ताकि फसल बीमा का लाभ न मिलने को लेकर मिलने वलाी शिकायतों को दूर किया जा सके। दरअसल, अभी सीमित संख्या में मौसम केंद्र होने की वजह से प्राकृतिक आपदा जैसे बाढ़, सूखा, आंधी–तूफान से फसल को होने वाले नुकसान का वास्तविक पता नहीं चल पाता और अपनी फसलों का बीमा कराने वाले किसानों को नुकसान उठाना पड़ता है। यहीं वजह है कि केंद्र ने सटीक मौसम जानकारी देने के लिए विंड्स योजना पूरे देश में लागू की है। छत्तीसगढ़ में पिछले साल से इस योजना को लेकर काम हो रहा है। इसी साल जनवरी में प्रदेश के सभी कलेक्टरों को भू-अभिलेख के संचालक ने पत्र लिखकर अपने जिलों में टीम बनाकर एआरजी और एडब्ल्यूएस के लिए स्थल चयन करने कहा था, लेकिन अभी तक किसी भी जिले की रिपोर्ट भू–अभिलेख को नहीं मिल पाई है। स्थल चयन भी नहीं किया जा सका है। हालांकि, योजना की टेंडर प्रक्रिया पूरी हो चुकी है, लेकिन जमीनी कार्य अब तक शुरू नहीं हो सका है। इस देरी से किसानों को मिलने वाला संभावित लाभ भी अधर में लटक गया है। प्रदेश के 730 राजस्व निरीक्षक मंडलों में वेदर स्टेशन लगने पर वर्षा से जुड़ा सही डेटा मिलेगा स्टेशन लगने से किसानों को ये फायदा होगा: विशेषज्ञों के अनुसार, यदि यह सिस्टम समय पर स्थापित हो जाता है तो ग्राम पंचायत स्तर पर वर्षा का सटीक माप, तापमान, हवा की गति और आर्द्रता जैसे डेटा रिकॉर्ड किए जा सकते थे। इन ऑटोमेटिक स्टेशनों से डाला सीधे विंड्स के पोर्टल पर रिकॉर्ड होगा और वहां से बीमा कंपनियां को जानकारी भेजी जाएगी। कंपनियां क्षति मूल्यांकन अधिक वैज्ञानिक ढंग से कर पातीं और किसानों को सही मुआवजा मिलता। वर्तमान में मौसम आधारित फसल बीमा दावों में अक्सर सामान्यीकृत डेटा का उपयोग होता है, जिससे कई बार किसानों को कम या गलत मुआवजा मिलता है। लेकिन विंड्स योजना के पूर्ण क्रियान्वयन से इस स्थिति में सुधार आने की पूरी संभावना है। विभागीय समन्वय की कमी का नतीजा: स्टेशन लगाने को लेकर विभागीय समन्वय की कमी साफतौर पर देखी जा रही है। दरअसल इस योजना में राजस्व विभाग के अंतर्गत भू–अभिलेख, कृषि, उद्यानिकी, मौसम विभाग के साथ ही इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय को शामिल किया गया है। इसमें सभी बड़ी जिम्मेदारी भू–अभिलेख की है। लेकिन अधिकारियों में आपसी तालमेल के अभाव में योजना शुरू नहीं हो पा रही है। बिलासपुर में भू–अभिलेख का उपायुक्त कार्यालय है, इसके अंतर्गत प्रदेश के आधे जिले आते हैं। यहां तो स्थल चयन रिपोर्ट को लेकर अधिकारी के पास जानकारी नहीं है। बिलासपुर के उद्यानिकी विभाग के अधिकारी के पास भी कोई जानकारी नहीं है। भू–अभिलेख शाखा बिलासपुर के अधिकारियों का कहना है कि स्थल चयन हो चुका है,पर अभी रिपोर्ट ऊपर नहीं भेजी गई है। कुल एआरजी में 10% में लगेगा तापमान सेंसर: विंड्स योजना के मुताबिक जितनी भी एआरजी स्थापित होगी, उसमें से 10 प्रतिशत में तापमान सेंसर लगाया जाना है। मौसम विज्ञान विभाग ने यह सुझाव दिया था कि ग्राम पंचायत में तापमान सेंसर का वितरण अच्छी तरह किया जाना चाहिए। यदि एआरजी छत पर लग रहा है तो सेंसर भी छत पर ही लगाए जाएं। छत्तीसगढ़ में 1162 एआरजी में तापमान सेंसर लगाए जाने हैं। सीधी बात – विनीत नंदनवार, संचालक, भू–अभिलेख टेंडर करा दिया, निर्णय शासन स्तर पर होगा विंड्स योजना में काम आगे क्यों नहीं बढ़ पा रहा है?
मेरा काम टेंडर कराना था, वह मैंने करवा दिया है।
पर अभी तक तो वेदर स्टेशन लगने के लिए जगह का भी चयन नहीं हुआ है?
जब एक्जीक्यूशन की बारी आएगी तो रिपोर्ट मंगा लेंगे, ये दो–तीन दिन का काम है।
अभी क्या स्थिति है?
मैंने टेंडर की प्रक्रिया पूरी कर प्रशासकीय विभाग को जानकारी भेज दी है, अब शासन स्तर पर निर्णय होगा। इधर, बिजली गिरने से मौतें बढ़ी, चेतावनी मिल रही है या नहीं, इसे लेकर पब्लिक सर्वे देश के अधिकांश इलाकों में भारी बारिश व बिजली गिरने से हो रही मौतों के मामले सामने आ रहे हैं। यही वजह है कि मौसम विज्ञान विभाग द्वारा एक ऑनलाइन पब्लिक सर्वे किया जा रहा है। इसमें विभाग यह पता लगाना चाहता है कि लोगों को बिजली और गरज के साथ तूफान की चेतावनी मिल रही है या नहीं। मिल रही है तो यह कितने समय पहले मिल रही है। बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, ओडिशा, झारखंड व छत्तीसगढ़ में बिजली गिरने से मौतों के सर्वाधिक मामले सामने आए हैं। ये प्रमुख प्रश्न पूछे गए


