अब केन-मंदाकिनी नदियां आपस में जुडेंगी:भोपाल में मंत्री सिलावट बोले- 2029 तक सिंचाई का रकबा एक करोड़ हेक्टेयर होगा

एमपी के जल संसाधन मंत्री तुलसीराम सिलावट ने मोहन सरकार के दो साल पूरे होने पर प्रेस कॉन्फ्रेंस कर विभागीय उपलब्धियां गिनाई। मंत्री सिलावट ने कहा- मध्यप्रदेश को जल संसाधनों के बेहतर प्रबंधन और सिंचाई विस्तार के क्षेत्र में देश के अग्रणी राज्यों की कतार में लाने के लिए जल संसाधन विभाग ने बीते वर्षों में ठोस काम किया है। विभाग की उपलब्धियां केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इनके दूरगामी प्रभाव कृषि, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और जल संरक्षण पर साफ नजर आते हैं। दस्तावेज में दी गई जानकारियों के आधार पर विभाग की प्रमुख उपलब्धियों और भविष्य की कार्ययोजना को अलग-अलग बॉक्स के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, ताकि पूरी तस्वीर स्पष्ट हो सके। सिंचाई रकबा एक करोड़ हेक्टेयर होगा
वर्तमान में प्रदेश में लगभग 54 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई सुविधा उपलब्ध है। सरकार का लक्ष्य अगले एक साल में इसे 65 लाख हेक्टेयर तक पहुंचाने का है। दीर्घकालीन योजना के तहत 2029 तक सिंचाई रकबा बढ़ाकर 100 लाख हेक्टेयर करने का रोडमैप तय किया गया है, जिससे कृषि उत्पादन में ऐतिहासिक बढ़ोतरी की उम्मीद है। केन–बेतवा लिंक परियोजना
यह देश की पहली अंतर-राज्यीय नदी जोड़ो परियोजना है, जिसे मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश मिलकर क्रियान्वित कर रहे हैं। परियोजना के अंतर्गत केन नदी के अधिशेष जल को बेतवा नदी में स्थानांतरित किया जाएगा। लगभग 44,605 करोड़ की लागत वाली इस योजना का मुख्य उद्देश्य बुंदेलखंड क्षेत्र की वर्षों पुरानी जल समस्या का समाधान करना है। परियोजना से लाखों हेक्टेयर कृषि भूमि को सिंचाई सुविधा मिलेगी और कई जिलों में पेयजल उपलब्धता सुनिश्चित होगी।
परियोजना के तहत दौधन बांध, लिंक कैनाल और सहायक संरचनाओं का निर्माण प्रस्तावित है। इससे सूखे की मार झेल रहे इलाकों में खेती को स्थिरता मिलेगी और पलायन पर भी अंकुश लगेगा। पीकेसी (पार्वती–कालीसिंध–चंबल) लिंक परियोजना
करीब ₹75,000 करोड़ की लागत वाली पीकेसी परियोजना मध्यप्रदेश की सबसे बड़ी नदी जोड़ो योजनाओं में से एक है। इसका उद्देश्य पार्वती, कालीसिंध और चंबल नदियों के जल का संतुलित उपयोग करना है।
इस परियोजना के माध्यम से मालवा और चंबल अंचल के जल अभावग्रस्त क्षेत्रों में सिंचाई क्षमता का व्यापक विस्तार किया जाएगा। परियोजना से कई जिलों में भूजल रिचार्ज बढ़ेगा और मानसून पर निर्भरता कम होगी। केन–मंदाकिनी लिंक परियोजना
करीब 10 हजार करोड़ रूपए की केन-मंदाकिनी परियोजना अपेक्षाकृत नई लेकिन रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण योजना है। इसके अंतर्गत केन नदी के जल को मंदाकिनी नदी से जोड़ने का प्रस्ताव है।
इस योजना का फोकस विंध्य और आसपास के उन क्षेत्रों पर है, जहां वर्षा असमान रहती है और सिंचाई सुविधाएं सीमित हैं। परियोजना के पूरा होने से स्थानीय कृषि, जल संरक्षण और पेयजल आपूर्ति को बड़ा संबल मिलेगा। नदियों और जलधाराओं से मजबूत आधार
मध्यप्रदेश को देश का “जल हृदय” कहा जाता है। राज्य में 260 प्रमुख नदियां और 702 छोटी जलधाराएं हैं। जल संसाधन विभाग ने इन प्राकृतिक स्रोतों को आधार बनाकर सिंचाई नेटवर्क के विस्तार और जल संरक्षण की योजनाएं तैयार की हैं। नदियों के कैचमेंट एरिया के संरक्षण और जल प्रवाह को संतुलित रखने पर विशेष जोर दिया गया है। नहरों का नेटवर्क मजबूत कर रहे
सिंचाई क्षमता बढ़ाने के लिए नहरों के निर्माण और सुदृढ़ीकरण को प्राथमिकता दी गई है। दस्तावेज के अनुसार 16 हजार किलोमीटर पक्की नहरें और 24 हजार किलोमीटर कच्ची नहरें विकसित करने का लक्ष्य है। इससे टेल-एंड किसानों तक भी समय पर पानी पहुंचाने की व्यवस्था मजबूत होगी। वृहद और निर्माणाधीन सिंचाई परियोजनाएं
प्रदेश में इस समय 32 वृहद सिंचाई परियोजनाएं संचालित हो रही हैं। इसके अलावा कुल 5987 सिंचाई परियोजनाएं विभिन्न चरणों में निर्माणाधीन हैं। इन परियोजनाओं के पूर्ण होने पर लाखों हेक्टेयर अतिरिक्त भूमि सिंचाई के दायरे में आएगी और कई जिलों की कृषि तस्वीर बदलेगी। माइक्रो इरिगेशन में देश में अग्रणी
ड्रिप और स्प्रिंकलर जैसी माइक्रो इरिगेशन तकनीकों के उपयोग में मध्यप्रदेश देश में पहले स्थान पर है। कम पानी में अधिक सिंचाई के इस मॉडल से सूखाग्रस्त और पहाड़ी क्षेत्रों को विशेष लाभ मिल रहा है। इससे जल की बचत के साथ-साथ फसल उत्पादकता भी बढ़ी है। सूखाग्रस्त और पहाड़ी क्षेत्रों पर फोकस
जल संसाधन विभाग ने विशेष रणनीति के तहत सूखाग्रस्त और पहाड़ी इलाकों में सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराने को प्राथमिकता दी है। छोटे बांध, बैराज, स्टॉपडैम और स्थानीय जल संरचनाओं के जरिए इन क्षेत्रों में पानी की उपलब्धता सुनिश्चित की जा रही है। जल संरक्षण और संवर्धन में सुधार
दस्तावेज में उल्लेख है कि जल संरक्षण और संवर्धन के प्रयासों से प्रदेश की स्थिति को सामान्यीकृत किया गया है। वर्षा जल संग्रहण, पुराने जल स्रोतों के पुनर्जीवन और भूजल रिचार्ज पर केंद्रित योजनाओं का सीधा असर जल स्तर पर पड़ा है। 2026 से 2029 तक का रोडमैप बताया
आने वाले वर्षों में विभाग का फोकस केवल नई परियोजनाओं पर नहीं, बल्कि मौजूदा संरचनाओं के आधुनिकीकरण पर भी रहेगा। सिंचाई क्षमता का अधिकतम उपयोग, पानी के रिसाव को रोकना, तकनीक आधारित निगरानी और किसानों तक समय पर जल आपूर्ति सुनिश्चित करना प्रमुख लक्ष्य हैं।

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