कुछ छात्रों के लिए सपने पूरे करना बहुत आसान होता है, लेकिन एक बड़ा वर्ग ऐसा है जिसके लिए गरीबी के चलते अथक संघर्ष के बाद भी सपने बिखर जाते हैं। गरीब परिवारों के छात्र प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी, कोचिंग की फीस जुटा नहीं पाते। ऐसे छात्रों के लिए बड़ा सहारा दे रही है रायपुर की ‘युवा संस्था’। यह युवाओं के सपनों को संसाधनों या पैसे की कमी के आगे दम नहीं तोड़ने देती। उसके यहां गरीब तबके के युवाओं को निशुल्क पढ़ाया जाता है। पिछले 25 साल में यहां से 530 युवा डिप्टी कलेक्टर, तहसीलदार, राजस्व निरीक्षक, पटवारी, व्याख्याता, बैंक ब्रांच मैनेजर और रेलवे स्टेशन मास्टर जैसे पदों पर पहुंच चुके हैं। ऐसे मुकाम पाकर वे आज राज्य की सेवा के साथ अपने परिवार को सुविधा-संपन्न जिंदगी दे पा रहे हैं। सफल छात्र देते हैं कोचिंग भवन का किराया संस्था के संस्थापक जीएसटी अधीक्षक एम. राजीव हैं। वे कहते हैं, गरीब परिवारों के प्रतिभावान बच्चे बहुत-कुछ हासिल कर सकते है, लेकिन संसाधन की कमी से इनका हौसला टूट जाता है। जमशेदपुर में मेरे परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। किताबें खरीदने या कोचिंग के पैसे नहीं होते थे। 1994 में नौकरी लगी तो मैं रायपुर आ गया। फिर घर से ही आसपास के जरूरतमंद बच्चों को पढ़ाना शुरू किया। फिलहाल 110 बच्चे प्रतियोगिता परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं। राजीव के मुताबिक, पहले कालीबाड़ी स्कूल के एक कमरे में बच्चों को रोज 2 घंटे पढ़ाना शुरू किया। बच्चे बढ़े, तब वर्ष 2019 से सिविल लाइन में एक मकान किराए पर लिया। खास बात यह है कि इस भवन का किराया यहां से पढ़कर सफल हुए बच्चे ही देते हैं। नौकरी मिलने पर छात्रों ने अपनी किताबें और नोट्स भी दूसरे जरूरतमंद बच्चों को दे दिए। साथ ही शनिवार-रविवार या अन्य सार्वजनिक अवकाश के दिन वे यहां आकर बच्चों को पढ़ाते भी हैं। हालात से संघर्ष कर सफल होने वालों की कहानियां रानू शुक्ला: वर्तमान में जगदलपुर के को ऑपरेटिव बैंक की ब्रांच मैनेजर हैं। वे कहती हैं, 2013 में एम कॉम किया। घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। कोचिंग लेते हुए मां अकेले मेहनत करके मुझे और मेरे भाई को पढ़ाती थीं। मां के भेजे पैसे खत्म हो गए। तभी एक मित्र ने युवा संस्था के बारे में बताया। फिर मैं यहां आ गई। राजीव सर ने दो साल तक पढ़ाया। 2015 में मैं बैंक में ब्रांच मैनेजर बन गई। सावित्री साहू: कभी रायपुर की झुग्गी बस्ती में रहीं सावित्री आज सहायक सांख्यिकी अधिकारी हैं। वे कहती हैं, पिता दैनिक वेतन भोगी कर्मचारी थे। मुझे दूसरों के घरों में काम करना पड़ा। 2004 में कॉलेज की सहेली ने युवा संस्था के बारे में बताया। राजीव सर ने पढ़ाया। किताबें दीं। एक साल बाद पटवारी बनीं, लेकिन मैंने पढ़ाई जारी रखी। 2014 में सांख्यिकी विभाग में चयन हुआ। अब समय मिलता है, तो बच्चों को पढ़ाने जाती हूं।


