भास्कर न्यूज | कवर्धा अलसी डंठल के रेशे से कपड़ा बनता है। इसके रेशे को निकाल कर किसान अतिरिक्त आमदनी कमा सकते हैं। इसे लेकर कृषि विज्ञान केन्द्र, कवर्धा और कृषि मौसम विभाग रायपुर के संयुक्त तत्वावधान में निकरा परियोजना के तहत जलवायु परिवर्तन प्रतिरोधक कृषि पर सेमिनार हुआ। रेवेन्द्र सिंह वर्मा कृषि महाविद्यालय एवं अनुसंधान केन्द्र बेमेतरा में हुए कार्यक्रम में किसानों को अलसी डंठल से रेशा निकालने की प्रक्रिया और इसके उपयोग की तकनीकी जानकारी दी गई। कृषि विज्ञान केन्द्र, कवर्धा ने कबीरधाम जिले के 30 किसानों को अलसी की किस्म आरएलसी 148 का प्रदर्शन ग्राम धरमपुरा, नेवारी और बिरकोना में कराया। इसका उद्देश्य किसानों को अलसी की खेती के प्रति आकर्षित करना और तिलहन की खेती का रकबा बढ़ाने के लिए प्रेरित करना था। इस प्रशिक्षण में किसानों को अलसी उत्पादन से होने वाले लाभ के साथ-साथ अलसी डंठल और उससे निकले रेशे को बेचकर अतिरिक्त आय अर्जित करने के उपाय भी बताए गए। निकरा परियोजना की दी विस्तार के साथ जानकारी कार्यक्रम का उद्घाटन केवीके कवर्धा के वैज्ञानिक व प्रमुख डॉ. बीपी त्रिपाठी ने किया। उन्होंने सेमिनार की रूपरेखा प्रस्तुत की। कृषि विज्ञान केन्द्र, बेमेतरा के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रमुख डॉ. तोषण कुमार ठाकुर ने अलसी फसल की जानकारी दी। अलसी बायो प्रोडक्ट की उपयोगिता भी बताई गई कार्यक्रम की अध्यक्षता रेवेन्द्र सिंह वर्मा कृषि महाविद्यालय एवं अनुसंधान केन्द्र, बेमेतरा के अधिष्ठाता डॉ. संदीप भंडारकर ने की। उन्होंने अलसी बायो प्रोडक्ट की उपयोगिता पर प्रकाश डाला। मुख्य अतिथि इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, रायपुर के निदेशक विस्तार डॉ. एसएस टुटेजा ने किसानों को अलसी फसल के लाभ और जागरूकता बढ़ाने के लिए जानकारी दी। निकरा परियोजना के तहत कबीरधाम जिले को अग्रणी कृषि विज्ञान केन्द्र के रूप में चुना गया है। कार्यक्रम में 50 किसानों ने लिया हिस्सा, उत्साह बढ़ा कार्यक्रम में कृषि अभियांत्रिकी के विषय विशेषज्ञ इंजीनियर टीएस सोनवानी और जिले के 50 किसानों ने भाग लिया। इस आयोजन में यह संदेश दिया गया कि अलसी डंठल से रेशा निकालने की प्रक्रिया किसानों को अतिरिक्त आय का नया स्रोत देगी।


