भास्कर न्यूज | अमृतसर आतंकवाद के दौर में 60 प्रतिशत दिव्यांग हुए पंजाब पुलिस के सेवानिवृत्त इंस्पेक्टर गुरदीप सिंह के बेटे को नौकरी नहीं मिल पाई है। आईजी स्तर से 3 बार सिफारिशें और डीजीपी कार्यालय के स्पष्ट आदेश भी जारी हो चुके हैं मगर 12 साल से जगजीत सिंह को नौकरी नहीं मिली है। गुरदीप सिंह का 2021 में स्वर्गवास हो गया। हालांकि गुरदीप सिंह की 70 वर्षीय पत्नी कुलवंत कौर बेटे को नौकरी दिलवाने के लिए अभी भी संघर्ष कर रही हैं। 5 माह पहले भी ई-मेल के जरिए आईजी हैडक्वार्टर सुखचैन सिंह गिल को नौकरी दिलवाने के लिए मांग की थी, लेकिन जबाव आया कि एक बेटे को पहले ही नौकरी मिल गई, दूसरे को पुलिस की नौकरी नहीं मिलेगी। जबकि पहले से बेटा संदीप सिंह 2012 का पंजाब पुलिस में भर्ती है और 2014 के डीजीपी रहे सुमेध सिंह सैनी ने गुरदीप सिंह को उनके दूसरे बेटे जगजीत सिंह को नौकरी देने के लिए ऑर्डर किया था। अब कुलवंत कौर ने सीएम भगवंत मान से अपील की कि सरकार इस मामले में हस्तक्षेप करे। कुलवंत कौर ने बताया कि पति गुरदीप सिंह 1964 में पंजाब पुलिस में भर्ती हुए थे। 2003 में अमृतसर देहाती से सेवानिवृत्त हुए थे। 2021 में उनका अचानक निधन हो गया। आतंकवाद के समय 1988 में जालंधर में एएसपी सुमेध सिंह सैनी को आतंकवादियों ने घेर लिया था। पति ने जान पर खेलकर सैनी को बचाया था। इस दौरान जीप पलटने से उनकी रीढ़ की हड्डी टूट गई थी और वह 60 प्रतिशत दिव्यांग हो गए थे। 2014 में सुमेध सिंह सैनी पंजाब के डीजीपी बने तो पति ने उनसे मुलाकात की। सैनी ने आतंकवाद के दौर में बढ़िया ड्यूटी करने पर बेटे को नौकरी देने के लिए एडीजीपी एमके तिवारी को स्पष्ट निर्देश दिए थे। इसके बावजूद अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई। आदेश आज भी डीजीपी कार्यालय में लंबित पड़े हैं। कुलवंत कौर ने बताया कि अमृतसर बार्डर रेंज के आईजी एसपीएस परमार ने 2018, 2020 और 2021 में आईजी स्तर से 3 बार लिखित सिफारिशें भेजीं। पत्रों में इंस्पेक्टर गुरदीप सिंह की बहादुरी और उत्कृष्ट सेवा का हवाला देते हुए बेटे जगजीत सिंह को पंजाब पुलिस में नौकरी देने की मांग की गई, लेकिन किसी स्तर पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। जगजीत सिंह ने बताया कि पिता इंस्पेक्टर गुरदीप सिंह ने आतंकवाद के दौर में अमृतसर देहाती क्षेत्र में सेवाएं दीं। इसी दौरान पिता 60 प्रतिशत दिव्यांग हो गए। उस समय विभाग की ओर से यह कहकर पल्ला झाड़ लिया गया कि यदि दिव्यांगता 100 प्रतिशत होती तभी नौकरी दी जा सकती थी। जगजीत सिंह ने कहा कि आतंकवाद का दौर कोई खेल नहीं था, जहां किसी को तय प्रतिशत में चोट लगती हो।


