‘पापा, अरगोड़ा चौक पर इतना बड़ा ‘अमर शहीद वीर बुद्धु भगत’ लिखा है, ये कौन हैं? इनका नाम बुद्धु क्यों है?’ यह सवाल सुन अशोक नगर के रहने वाले सुकेश पल भर के लिए सोच में पड़ गए। उन्होंने बेटे से कहा कि ये बुद्धु नहीं, बुधू भगत हैं और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में अंग्रेजों के साथ लड़ाई में शहीद हुए स्वतंत्रता सेनानियों में एक थे। उनका इतना खौफ था कि 1831-32 में अंग्रेजों ने उनका सिर काटने वाले को 1000 रुपए इनाम देने की घोषणा की थी।’ गुुरुवार को बुधू भगत का 193वां शहादत दिवस है। बच्चे के इस सवाल में एक बड़ा सवाल यह भी है कि हमारे इस महानायक का गलत नाम क्यों लिखा हुआ है। दरअसल राजधानी के व्यस्त चौराहा अरगोड़ा चौक के बीचोंबीच छह फीट चौड़े पत्थर पर बड़े-बड़े अक्षरों में महानायक अमर शहीद वीर बुद्धु भगत अंकित है। चौक का नामकरण भी वीर बुद्धु भगत चौक पर किया गया है। रोज हजारों लोग यहां से गुजरते हैं। सभी ‘बुद्धु’ पढ़कर एक बार चौंकते हैं। असल में इस वीर का नाम बुधू भगत है, न कि बुद्धु भगत। टीआरआई की किताब व हाल में राजभवन में लगी प्रतिमा पर बुधू ही अंकित है। रांची से करीब 50 किमी दूर चान्हो के पास सिलागाईं वीर बुधू भगत का गांव है, जहां आज भी उनकी पिंडी (कटे सिर) की पूजा होती है। घोड़े पर सवार उनकी प्रतिमा और हाथ में बड़ी तलवार उनकी वीरता की कहानी कहती है। उनके वंशज शिवपूजन भगत कहते हैं कि झारखंड में जन्म के दिन के अनुसार ही नाम पड़ता है। दोनों बेटों के साथ लड़ते हुए शहीद हो गए थे आजादी की पहली लड़ाई से काफी पहले 1820 से ही वीर बुधू भगत ने अंग्रेजों के खिलाफ उलगुलान शुरू कर दिया था। उनके नाम से अंग्रेज थर-थर कांपते थे। उनका खौफ ऐसा था कि 1831-32 में अंग्रेजों ने उनका सिर काटने वाले को 1000 रुपए इनाम देने की घोषणा की थी। कोल और लरका विद्रोह के अमर शहीद वीर बुधू भगत के दो पुत्र थे गिरिधर व हलधर। दोनों उनके साथ ही शहीद हो गए थे। वीर के सिर की पिंडी की होती है पूजा युद्ध के दौरान जब वीर बुधू भगत के अनुयायी घिर गए तो उन्होंने खुद ही अपना सिर काट लिया। यह युद्धभूमि में न गिरकर उनके घर के दरवाजे के पास जा पहुंचा। वह पिंडी आज भी दरवाजे के बगल में मौजूद है। उनके वंशज इसे सुरक्षित रखे हुए हैं और इसकी सब पूजा-अर्चना करते हैं।


