आज पढ़िए चाइल्ड राइट्स ए​क्टिविस्ट का अनुभव:रेस्क्यू में बच्चे डरे हुए मिलते हैं, उन्हें हम बहुत मुश्किल से समझा पाते हैं कि वे अब सुरक्षित हैं

मैं 2019 से बच्चों को बाल श्रम से मुक्त करवाने का काम कर रही हूं। अब तक हमारी टीम करीब 4 हजार बच्चों को मुक्त करा चुकी है। इनका बचपन छिन चुका होता है। वे अपने साथ डर और मजबूरी लेकर आते हैं। रेस्क्यू के दौरान हालात कई बार बहुत कठिन हो जाते हैं। साल 2023 की एक घटना है। जयपुर की भट्टा बस्ती में एक बच्चे के बाल मजदूरी में फंसे होने की सूचना मिली थी। जिस घर में हम गए, वह एक वकील का था। हमें पता नहीं था। वकील वहां आया, उसे शायद हमारे बारे में पता लग गया था। उसने हमें बाहर से बंद कर दिया। झड़प हुई, धमकियां मिलीं, लेकिन पुलिस फोर्स साथ थी, इसलिए हम सुरक्षित निकल पाए। उसी साल सूचना मिली कि भट्टा बस्ती में 25 बच्चों से चूड़ियों का काम कराया जा रहा है। हमारे पहुंचने से पहले ही कारखाना मालिक बच्चों को घर में बंद कर चला गया। हम दूसरे मकान से गए तो देखा कि पहली मंजिल पर छोटे कमरे में 26 बच्चे थे। मेडिकल जांच में 3 कुपोषित मिले, फिर उनका इलाज कराया गया। रेस्क्यू के समय बच्चे बहुत डर जाते हैं और रोने लगते हैं। तब हमें उन्हें समझाना पड़ता है कि वे सुरक्षित हैं। जब हमें बाल श्रम की सूचना मिलती है तो पहले रेकी करते हैं। जानकारी पुख्ता होने पर ही पुलिस से संपर्क करते हैं। रेस्क्यू के बाद बच्चों को ऐसे थाने में ले जाते हैं, जहां बाल मित्र केंद्र होते हैं। वहां उनकी काउंसलिंग होती है। कानूनी प्रक्रिया पूरी नहीं होती, तब तक बच्चे चाइल्ड केयर इंस्टीट्यूट में रहते हैं। बाद में जिला बाल संरक्षण इकाई उन्हें घर पहुंचाती है। कई बार मैं भावुक भी हो जाती हूं। मैं खुद एक मां हूं। ऐसे बच्चों को देखकर खुद को संभालना मुश्किल हो जाता है। मुझे 9 साल का एक बच्चा याद है, जिसे हमने बाल श्रम से मुक्त कराया था। जब मैंने उसे मिठाई दी तो वह रोने लगा, क्योंकि उसने डेढ़ साल बाद मीठा खाया था। काम मुश्किल है, लेकिन बच्चे फोन कर धन्यवाद कहते हैं, तो ​संतुष्टि मिलती है।
-जैसा ईशा सिंह को बताया

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