आज फिल्ममेकिंग में तकनीक बहुत जरूरी हो गया:निरेन भट्ट बोले- राइटर एरोगेंट न हो, क्रिएटिव होना चाहिए, फेस्ट में 62 फिल्मों की स्क्रीनिंग

जयपुर इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल (JIFF) के चौथे दिन सिनेमाई विविधता और कहानी कहने की कला का अनूठा प्रदर्शन देखने को मिला। इस दिन 62फिल्मों की स्क्रीनिंग हुई, जिनमें 18 फीचर फिक्शन, 24 शॉर्ट फिक्शन और 3 डॉक्यूमेंट्री फीचर्स शामिल थीं। इस दिन का मुख्य आकर्षण भारतीय परंपरा और वैश्विक सिनेमा का संगम रहा, जो जिफ के कहानी कहने के समर्पण और सिनेमाई उत्कृष्टता को दर्शाता है। फीचर फिक्शन श्रेणी में अलग-अलग भाषाओं और विषयों पर आधारित कहानियां पेश की गईं। धीरू यादव की भोजपुरी फिल्म जया ने सामाजिक बाधाओं को पार करने की एक प्रेरणादायक कहानी प्रस्तुत की। एंटोनियो रोड्रा की स्पैनिश फिल्म एंड ऑफ ट्रिप ने जीवन और नियति के बदलते पहलुओं को गहराई से छुआ।​​​​​​​ दीपंकर प्रकाश की राजस्थानी फिल्म शांति निकेतन ने विरासत और पहचान की खोज को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया।​​​​​​​ बिपिन जाटे की तमिल फिल्म रज़ाकर ने तमिल इतिहास के एक अनकहे अध्याय को उजागर किया।हॉरर प्रेमियों के लिए दिनेश राजपुरोहित की फिल्म आवकारा ने रोमांच और सस्पेंस का अद्भुत अनुभव दिया। फेस्टिवल में भारतीय सिनेमा की दो महान फिल्मों की विशेष स्क्रीनिंग हुई। नीचा नगर फिल्म भारतीय सिनेमा की अमिट छवि और वैश्विक मंच पर इसकी ऐतिहासिक उपस्थिति को दर्शाती है। ​​​​​​​मीरानायर की कालजयी फिल्म सलाम बॉम्बे! दर्शकों को भारतीय समाज के गहरे पहलुओं से जोड़ने में सफल रही। कोलोब्रेटिव व एक्सपेंसिव आर्ट फोर्म है फिल्ममेकिंग जयपुर इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल (जिफ) के तीसरे दिन आयोजित एक सेशन में ‘स्त्री-2’, ‘मुंज्या’ और ‘भेड़िया’ जैसी फिल्मों के राइटर निरेन भट्ट ने अपने सफर के बारे में बताया। फिल्ममेकर प्रज्ञा राठौड़ के साथ बातचीत में उन्होंने बताया कि थिएटर से अपने करियर की शुरुआत करने के बाद उन्होंने कुछ गुजराती नाटक लिखे और फिर टीवी शो, गुजराती फिल्में लिखते-लिखते हिन्दी फिल्म लेखन की शुरुआत की। हॉरर व कॉमेडी के अनूठे संयोजन के लिए पहचाने जाने वाले निरेन ने बताया कि वे भारतीय पौराणिक कथाएं व लोक कथाएं पढ़ते हुए बड़े हुए हैं, जिसका असर उनकी लेखनी में साफ दिखाई देता है। एक सवाल के जवाब में उन्होंने बताया कि फिल्म मेकिंग एक कोलैबोरेटिव व एक्सपेंसिव आर्ट फोर्म है, जो कई कलाओं व तकनीकों का संयोजन होता है, लेकिन इनमें सभी लोग एक स्क्रिप्ट को फॉलो करते हैं। उन्होंने भेड़िया, मुंज्या व स्त्री-2 का उदाहरण देते हुए बताया कि आजकल की फिल्म मेकिंग में तकनीक की काफी अहम भूमिका हो गई है। उन्होंने बताया कि स्क्रिप्ट राइटिंग आसान काम नहीं है, उन्होंने कई बार तो फिल्म के 30-40 ड्राफ्ट तक लिखे हैं। उन्होंने युवा लेखकों को संदेश दिया कि एक राइटर के तौर पर आप एरोगेंट नहीं हो सकते, बल्कि आपको क्रिएटिव होना होता है। फिल्मों में एआई के इस्तेमाल पर उन्होंने स्पष्ट कहा कि यह मशीन का एल्गोरिदम होता है, यह वही रिजल्ट देगा, जो अब तक हो चुका है। एआई इंसानी दिमाग का स्थान कभी नहीं ले सकता, क्योंकि एआई या मशीन दर्द, पीड़ा, प्यार व तनाव जैसे इमोशंस का अहसास नहीं कर सकते हैं, इन्हें सिर्फ इंसान ही समझ पाते हैं। उन्होंने कहा कि मैं अपनी स्क्रिप्ट में अलग ह्यूमर का उपयोग करता हूं, जिसमें सोश्यल कमेंट और सटायर शामिल होते हैं। निरेन ने फिल्म निर्माण में स्क्रिप्ट राइटिंग को डिस्कवर करने की प्रोसेस बताते हुए कहा कि फिल्म लेखन के समय ही उसकी लैंग्वेज सहित अन्य पहलू निर्धारित करने होते हैं। उन्होंने यहां उपस्थित एक श्रोता की बात पर सहमति जताते हुए कहा कि फिल्म का राइटर ही असली हीरो होता है, उसे पैसा भी मिलता है, लेकिन हीरो जैसा नाम नहीं मिल पाता। उन्होंने नए राइटर्स को सुझाव दिया कि वे अपने शुरुआती दौर में पहले प्ले, यूट्यूब व इंस्टाग्राम जैसे माध्यमों के जरिए स्वयं की क्रिएटिविटी को साबित करे, उसके बाद इंडस्ट्री की ओर रुख करें। डॉक्यूमेंट्री में कंटेंट ही है सबसे अहम पार्ट ‘डॉक्यूमेंट्री सिनेमा : कैप्चरिंग द रीयल इन द पास्ट-ट्रुथ वर्ल्ड’ सेशन में फिल्ममेकर अरिजीत मित्रा ने बताया कि अब फिल्मों का कल्चर बदल रहा है, बड़ी डॉक्यूमेंट्री बनाई जा रही है, जिन्हें लोग पसंद भी कर रहे हैं। उन्होंने डॉक्यूमेंट्री मूवीज में कंटेंट को सबसे अहम पार्ट बताते हुए निर्माताओं को सुझाव दिया कि वे इनमें रीयल लाइफ फुटेज का अधिकतम उपयोग करें और विषय सोशल रिलेवेंट हो, ताकि इससे अधिक से अधिक लोग जुड़ सकें। उन्होंने फिल्म के प्रभावी कंटेंट के लिए उपयुक्त रिसर्च की आवश्यकता पर जोर दिया। दुनियाभर में बढ़ रहा है वुमन फिल्ममेकर्स का दबदबा फिल्म फेस्टिवल के तहत अंतिम सेशन ‘वर्ल्ड सिनेमा एंड वुमन फिल्ममेकर्स’ विषय पर हुआ। इसमें अमेरिका की फिल्ममेकर नीरा जावेरी, स्पेन के फिल्म निर्माता एंटोनियो रोड्रिगेज काबाल और बांग्लादेश की सिनेमा व टीवी अभिनेत्री सोहाना सबा ने विषय के बारे में चर्चा की। इन सभी पैनलिस्ट्स ने एक स्वर में स्वीकारा कि अब फिल्म इंडस्ट्री में महिलाओं की स्थिति पहले जैसी नहीं रही है। अब महिलाएं न सिर्फ अभिनय में, बल्कि फिल्म निर्माण में भी अपनी प्रतिभा को साबित करते हुए कई बेहतरीन फिल्में बना रही हैं। नीरा जावेरी ने कहा कि फिल्म मेकिंग के क्षेत्र में अब महिला व पुरुष होना कोई मुद्दा नहीं रह गया है। इस क्षेत्र में काफी तेजी से बदलाव आया है। एंटोनियो ने स्पेन के संदर्भ में कहा कि महिलाएं फिल्म निर्माण के क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ रही हैं और कई गंभीर विषयों के फिल्में बना रही हैं। जेंडर के तौर पर महिला होना कोई इश्यू नहीं है, बल्कि इश्यू यह है कि फिल्मों के जरिए हम क्या दिखाना चाहते हैं। सोहाना सबा ने बताया कि महिलाएं इस फील्ड में न सिर्फ पर्दे पर, बल्कि कैमरा के पीछे भी काफी एक्टिव हैं। इस क्षेत्र की चुनौतियों की बात करते हुए नीरा जावेरी ने बताया कि मैं अपने आप को कभी भी एक महिला फिल्ममेकर नहीं मानती, बल्कि एक कलाकार मानते हुए काम करती हूं। हालांकि सोहाना सबा ने यह स्वीकार किया कि उन्हें शुरुआती दौर में कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा, लेकिन काफी कम उम्र होने और वहां की संस्कृति की वजह से। लेकिन हमेशा पॉजिटिव रहते हुए और इनका सामना करते हुए आगे बढ़ती गई। नीरा ने बताया कि एक महिला फिल्म निर्माता होने के तौर पर आप में डिफरेंस स्वयं से नहीं आता, बल्कि इस बात से आता है कि दूसरे आपके बारे में क्या सोचते हैं। उन्होंने महिला फिल्म निर्माताओं को इस बात को इग्नोर कर आगे बढ़ने का सुझाव दिया। एंटोनियो ने कहा कि स्पेन व यूरोप में महिला कलाकारों को कम पेमेंट किया जाता है, लेकिन अब समय बदल रहा है और आज की जनरेशन इसके लिए लड़ रही है। सेशन में मौजूद एंटोनियो की बेटी ने कहा कि अब स्पेन में महिला फिल्म निर्माताओं की संख्या बढ़ रही है। महिला व पुरुष के अंतर पर बात करते हुए सोहाना सबा ने कहा कि एक कलाकार के तौर पर पुरुष जहां 50-60 वर्ष तक काम कर लेते हैं, वहीं महिला को तुलनात्मक रूप से इस उम्र तक इतना काम नहीं मिल पाता है। महिला फिल्म निर्माताओं के कंटेंट पर बोलते हुए एंटोनियो की बेटी ने कहा कि इनके कंटेंट अधिक बेहतर और सोशल इश्यूज पर आधारित होते हैं। नीरा ने बताया कि कुछ मुद्दों को सिर्फ महिलाएं ही बेहतर तरीके से समझ सकती हैं। सोहाना सबा ने महिला फिल्म निर्माताओं को सुझाव दिया के वे ईमानदारी से और पूरे दिल से काम करें। योगा लवर इजराइली फिल्ममेकर ने किया शीर्षासन जिफ के तहत इजराइल के फिल्म निर्माता एलिक फ्रॉमचेंको भी शामिल हुए। उन्होंने अपनी फिल्म ‘गर्ल इन द बुश’ पर बात करते हुए बताया कि यह आतंकवादियों के जान बचाकर झाड़ियों में छिपी एक लड़की की कहानी है। इसमें बताया गया है कि लड़की किस प्रकार मां दुर्गा के आशीर्वाद से सुरक्षित बच सकी। एलिक ने बताया कि वे योग से काफी प्रभावित हैं और गत 20 वर्ष से लगातार योग कर रहे हैं और 2 साल से पुणे के एक केंद्र से जुड़कर मेडिटेशन भी कर रहे हैं। एलिक फ्रॉमचेंको ने फिल्म फेस्टिवल के दौरान शीर्षासन भी करके दिखााया।

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