‘पहले कहीं जाना होता था तो रिक्वेस्ट करनी पड़ती थी, अब बस बताकर निकल जाते हैं। उड़ने लगे हैं अब, अब नहीं रुकेंगे।’ यह कहना है जयपुर के पास स्थित गांव रामसर पालावाला की टीना शर्मा का, जो कभी घर की चार दीवारियों में सिमटी थीं, लेकिन आज आत्मनिर्भरता की नई उड़ान भर रही हैं। टीना जैसी रामसर पालावाला की कई महिलाएं अब पुराने बिना इस्तेमाल हुए कपड़ों के कचरे से सुंदर प्रोडक्ट बना रही हैं और आत्मनिर्भर बन रही हैं। मायसा जयपुर और पीपुल अवेयरनेस नेटवर्क सोसाइटी (पैन्स) इन्हें हुनर और बाजार उपलब्ध कराकर न केवल आर्थिक रूप से सशक्त बना रहे हैं, बल्कि कपड़ा उद्योग के प्रदूषण को भी कम कर रहे हैं।मायसा जयपुर की सीईओ पिंकी जैन बताती हैं कि जयपुर की फैक्ट्रियों में 30% कपड़ा बिना इस्तेमाल वाला कपड़ा वेस्ट होता है। इसे इकट्ठा कर गांव की महिलाएं वॉशेबल टॉय, बैग, पैकेजिंग मटेरियल बनाती हैं। ये सब बनाने में जो कचरा निकलता है, उसका पेपर बना लिया जाता है, फिर उस पेपर के पोस्टकार्ड या डायरी बन जाती है। अब तक 8000 किलो फैब्रिक अपसाइकल किया जा चुका है। 30 महिलाओं से शुरू हुई इस पहल से अब 125 महिलाएं जुड़ चुकी हैं, जो संस्था में खुद लीडरशिप ले रही हैं, एग्जीबिशन लगा रही हैं और हर महीने औसतन 6000-7000 रुपए कमा रही हैं। पैन्स एनजीओ के जितेंद्र भाटी बताते हैं कि वे इन्हें डिजिटल स्किल्स भी सिखा रहे हैं, जिससे वे अपने प्रोडक्ट्स को ऑनलाइन बेच सकें। यह पहल अब जयपुर के हिम्मतपुरा, खोखावाला और इसारवाला जैसे गांवों तक फैल गई है। पर्यावरण को भी बचाने में निभा रहीं अहम भूमिका गांव की ये महिलाएं न सिर्फ आत्मनिर्भर बन रही हैं, बल्कि पर्यावरण को बचाने में भी अहम भूमिका निभा रही हैं। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के अनुसार, कपड़ा उद्योग दुनिया में पानी का दूसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता है और कुल कार्बन उत्सर्जन का 10% हिस्सा इसी से आता है। जो अंतरराष्ट्रीय उड़ानों और समुद्री शिपिंग से भी अधिक है।


