केंद्रीय सरना समिति ने गुरुवार को केंद्रीय धुमकुड़िया भवन में पेसा कानून-1996 पर महाबहस का आयोजन किया। झारखंड आंदोलनकारी सूरज सिंह बेसरा ने कहा कि पेसा कानून संविधान की पांचवीं अनुसूची वाले क्षेत्रों में आदिवासियों की पारंपरिक शासन व्यवस्था को वैधता देता है। लेकिन, आज समाज को दिग्भ्रमित किया जा रहा है। पूर्व मंत्री देवकुमार धान ने कहा कि आठ राज्यों में पेसा कानून लागू है। झारखंड और ओडिशा में पेसा कानून लागू नहीं हुआ है। पेसा कानून में ग्राम सभा को अधिकार दिया गया है। सरकारी कामकाज और योजना को धरातल पर उतारने के लिए पेसा बना है। इसके लिए कानूनविदों की एक टीम बनानी होगी। समाज में जागरूकता अभियान चलाना होगा। केंद्रीय सरना समिति के अध्यक्ष फूलचंद तिर्की ने कहा कि पेसा पंचायत को दिया गया अधिकार है। पेसा का मतलब अनुसूचित क्षेत्रों में रूढ़ीवादी संस्कृति को अधिकार देना है। इसमें सर्वेसर्वा ग्रामप्रधान होता है, िजसका चयन गांव के लोग करते हैं। आदिवासी लोहरा समाज के अध्यक्ष बालमुकुंद लोहरा ने कहा कि पेसा कानून का मतलब गांव की सरकार है। आदिवासियों की सुरक्षा के लिए संविधान में पांचवीं अनुसूची जोड़ी गई है। पूर्व वार्ड पार्षद नकुल तिर्की ने कहा कि देश संविधान और कानून से चलता है। कुंदरसी मुंडा ने कहा कि पेसा कानून जल्द लागू होना चाहिए। गांव को संरक्षित करने के लिए पेसा जरूरी है।


