रांची यूनिवर्सिटी के जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग की कहानी एक विभाग की नहीं, बल्कि उस सिस्टम की है जो अपने ही शिक्षकों को तीन दशक तक प्रतीक्षा, पीड़ा और उपेक्षा के अंधे गलियारे में भटकाता रहा। तीन दशक से अधिक सेवा देने वाले इन शिक्षकों ने नई पीढ़ी को योग्य और शिक्षित बनाने में अपनी क्षमा का पूरा उपयोग किया। इन्हें जिस पद पर नियुक्त हुए थे, आज भी उसी जगह खड़े हैं। टीआरएल के कुड़ुख, मुंडा, संताली, हो, खड़िया, नागपुरी समेत अन्य भाषाओं के शिक्षक सेवा देने के अंतिम पड़ाव में निराश और मायूस हैं। प्रभावित शिक्षक बताते हैं कि प्रदेश की भाषाई विरासत को विश्ववि ्यालयों में स्थान दिलाने में जीवन लगा दिया, लेकिन यूनिवर्सिटी के दूसरे शिक्षकों की प्रमोशन नहीं मिला। हम लोगों से दो दशक बाद सेवा में आए शिक्षकों को भी प्रमोशन मिल गया, लेकिन आज भी प्रमोशन का इंतजार है। टीआरएल शिक्षकों की नियुक्ति की स्वीकृति वर्ष 1989 से मिली है। लेकिन आर्थिक लाभ, वेतनमान और अन्य सुविधाएं वर्ष 2006 से देने पर सहमति बनी थी। प्रमोशन और अन्य सुविधाओं को लेकर शिक्षकों ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी। वर्ष 1996 में कोर्ट ने शिक्षकों के पक्ष में फैसला सुनाया। लेकिन आज तक प्रमोशन नहीं मिला। 17 शिक्षक दुनिया छोड़ गए, 48 रिटायर 51 में से 17 शिक्षक अब जीवित ही नहीं है। जबकि 28 रिटायर होकर घर चले गए। लेकिन दुखद तथ्य यह है कि- इनमें से किसी को भी एक भी प्रमोशन जीवन में नहीं मिला। जिस पद पर नियुक्ति हुई थी, उसी पद पर पूरी सेवा समाप्त कर दी गई। यह विश्वविद्यालय इतिहास के सबसे लंबे प्रमोशन पेंडिंग मामलों में गिना जाता है।


