इंटरनेशनल मेगा फूड घोटाला केस:CBI ट्रायल कोर्ट से आरोपियों को जमानत, सुप्रीम कोर्ट ने FIR की थी बहाल

सीबीआई द्वारा दर्ज बहुचर्चित आर्थिक अपराध के मामले में पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने इंटरनेशनल मेगा फूड पार्क लिमिटेड से जुड़े उद्योगपति सुखिंद्र सिंह, समरिंदर सिंह सहित अन्य आरोपियों को अग्रिम जमानत दे दी है। कोर्ट ने साफ कहा कि सिर्फ समन जारी होने के आधार पर आरोपियों को जेल भेजना उचित नहीं है। CBI ने साल 2022 में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की थी। ट्रायल कोर्ट ने 2023 में आगे की जांच के आदेश दिए। इसके बाद 2024 में हाईकोर्ट ने FIR रद्द कर दी थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का आदेश पलटते हुए FIR बहाल कर दी। इसके बाद CBI ने आगे की जांच पूरी कर चार्जशीट दाखिल की और CBI ट्रायल कोर्ट ने आरोपियों को समन जारी किया। CBI ट्रायल कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के महदोम बावा बनाम CBI केस फैसले का हवाला देते हुए कहा कि इस मामले में जांच पूरी हो चुकी है और चार्जशीट दाखिल की जा चुकी है। अब तक किसी भी आरोपी को गिरफ्तार नहीं किया गया है, इसलिए कस्टोडियल इंट्रोगेशन की जरूरत नहीं है। सीबीआई की ओर से भी अग्रिम जमानत का विरोध नहीं किया गया। ऐसे में कोर्ट ने कुछ शर्तों के साथ आरोपियों को राहत दी। बुलाए जाने पर जांच में करना होगा सहयोग जमानत देते हुए ट्रायल कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आरोपियों को जांच एजेंसी द्वारा बुलाए जाने पर हर बार पेश होकर जांच में पूरा सहयोग करना होगा। साथ ही उन्हें मामले से जुड़े किसी भी गवाह को प्रभावित करने, धमकाने या साक्ष्यों से छेड़छाड़ करने से रोका गया है। इसके अलावा कोर्ट ने शर्त रखी है कि आरोपी CBI ट्रायल कोर्ट की पूर्व अनुमति के बिना देश से बाहर नहीं जाएंगे। जानिए पूरा मामला सीबीआई ने यह एफआईआर स्मॉल इंडस्ट्रीज डिवेलपमेंट बैंक ऑफ इंडिया (SIDBI) के उप महाप्रबंधक पंकज कुमार साहू की शिकायत पर दर्ज की थी। शिकायत में मेसर्स इंटरनेशनल मेगा फूड पार्क लिमिटेड और उससे जुड़ी कंपनियों के निदेशक/प्रवर्तक सुखिंद्र सिंह, कंवल सुखिंद्र सिंह, समरिंदर सिंह समेत अन्य पर आरोप लगाए गए। आरोप के मुताबिक, आईएमएफ पीएल ने 11 नवंबर 2011 को 1500 लाख रुपए के टर्म लोन के लिए आवेदन किया, जिसे 1 मार्च 2012 को मंजूरी मिली। यह राशि 28 अगस्त 2012 से 7 जुलाई 2015 के बीच छह किस्तों में प्लांट और मशीनरी की खरीद के लिए जारी की गई। इसके बाद 9 जून 2014 को कंपनी ने फिर से टर्म लोन-2 (1500 लाख रुपए) और टर्म लोन-3 (350 लाख रुपए) के लिए आवेदन किया। इन ऋणों की राशि 31 दिसंबर 2014 से 14 दिसंबर 2015 के बीच आठ किस्तों में वितरित की गई। बाद में जून 2017 में ये खाते एनपीए घोषित कर दिए गए, क्योंकि ऋण का भुगतान नहीं हुआ। फंड डायवर्जन और फर्जी दस्तावेजों का आरोप सीबीआई का आरोप है कि मशीन आपूर्तिकर्ता मेसर्स फूड एंड बायो-टेक इंजीनियर्स (इंडिया) प्राइवेट लि. को किए गए प्रत्यक्ष भुगतानों में से 300 लाख रुपए आईएमएफ पीएल को उसकी सहयोगी कंपनियों के जरिए वापस भेजे गए। इसके अलावा, आईएमएफ पीएल की सहयोगी कंपनी इंटरनेशनल फ्रेश फॉर्म प्रोडक्ट्स इंडिया लि. ने 2011 से 2017 के बीच 1954 लाख रुपए के अलग-अलग ऋण लिए, जिनमें से 765 लाख रुपए आईएमएफ पीएल को वापस भेजे गए। यह भी आरोप है कि कंपनी ने टर्म लोन हासिल करने के लिए गलत जानकारी और जाली दस्तावेज प्रस्तुत किए और ऋण राशि का व्यक्तिगत लाभ के लिए दुरुपयोग किया। इससे एस आईडीबीआई को ब्याज सहित 4014.75 लाख रुपए का नुकसान हुआ।

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