मन की स्थिति बड़ी विचित्र है, क्षण भर में हम रुष्ट हो जाते हैं, क्षणभर में ही खुश हो जाते हैं। बाहर के उतार चढ़ाव को तो हम रोक नहीं सकते, लेकिन मेरी भावना की ये पक्तियों को यदि हम जीवन में चरितार्थ कर लें, तो हमारा जीवन धन्य हो जाएगा। हमने भूल से पुण्य और पाप के फल को अपना मान लिया। मुनि प्रमाण सागर जी महाराज ने सोमवार को रामचंद्र नगर स्थित आदिनाथ बाग में यह बात कही। उन्होंने कहा कि होकर सुख में मग्न न फूले, दुःख में कभी न घबरावे, इष्ट वियोग और अनिष्ट योग में, सहनशीलता दिखलावे” यही धर्म का अंतरंग पक्ष है। अंदर की समता अर्थात ठहराव लाकर आप सदा बाहर प्रसन्न रह सकते हैं। मुनिश्री ने कहा कि हम लोगों के मन में जब इष्ट का वियोग और अनिष्ट का संयोग होता है, तो कई प्रकार के विकल्प आते हैं और जब भी मन के विरुद्ध कुछ घटता है, तो मन परेशान हो जाता है। संत कहते हैं कि थोड़ा विचार करो संसार में जो कुछ भी घट रहा है क्या सब कुछ तेरे हाथ में है? जब तेरे हाथ में कुछ भी नहीं है, तो तू क्यों परेशान होता है, “वस्तु का परिणमन मेरे स्वभाव से नहीं उसका परिणमन उसके स्वभाव से होता है” जब यह बात समझ लोगे तो इष्ट अनिष्ट विकल्प नहीं आएंगे। मुनिश्री ने कहा कि यह हमारी भूल है कि हमने पुण्य और पाप के फल को अपना मान लिया और यह धारणा बना ली कि जो में जो चाहूं वह कर सकता हूं, जैसा में चाहूं और जो मैं करूं वही हो। इसी बुद्धि से प्रेरित होकर मैंने इष्ट और अनिष्ट की कल्पना की और अपने विचारों को दूसरे पर थोपा अपने विचारों से किसी को अच्छा और किसी को बुरा कहा। धर्म समाज प्रचारक राजेश जैन दद्दू एवं प्रवक्ता अविनाश जैन ने बताया कार्यक्रम के शुभारंभ में आचार्यश्री के चित्र का अनावरण एवं दीप प्रज्जवलन धर्म प्रभावना समिति के पदाधिकारियों ने किया। इस अवसर पर अध्यक्ष अशोक रानी डोसी, महामंत्री हर्ष जैन, नवीन आनंद गोधा, कमल अग्रवाल, अनिल गांधी, डॉ. जैनेन्द्र जैन, विपुल बांझल सहित रामचंद्र नगर के पदाधिकारी बड़ी संख्या में उपस्थित थे। इस अवसर पर मुनि सेवा से जुड़े कार्यकर्ताओं ने शास्त्र भेंट किए तथा स्मृति नगर, संगम नगर, अंजली नगर के सदस्यों ने गुरु चरणों श्री फल अर्पित कर उनकी कॉलोनी में पधारने का अनुरोध किया। संचालन अभय भैया ने किया।


