मध्यप्रदेश के वन मंडलों में गिद्धों की गिनती की जा रही है। इंदौर में 22 गिद्धों की जानकारी वन विभाग को मिली है। महू, इंदौर, मानपुर, रालामंडल, चौरल में गिद्ध पाए गए हैं। 3 दिन की गणना में 18 व्यस्क और 4 अवयस्क गिद्ध मिले हैं। टीम को 5 घोंसले भी मिले हैं। पिछले साल की गिनती की तुलना में यह कम है, लेकिन प्रदेश और भारत में गिद्धों की संख्या बढ़ रही है। इंदौर में 2 तरह के गिद्ध व्हाइट वल्चर और दूसरा इजिप्शियन वल्चर मिले हैं। वनमंडलाधिकारी वीरेंद्र कुमार पटेल ने बताया- गिद्धों की गिनती सुबह-सुबह की जाती है। गिद्धों के रहने के स्थान पेड़, पहाड़ियां, चट्टानों पर उन्हें सर्च किया जाता है। जब गिद्ध मिलते हैं तो उनकी फोटो लेकर काउंटिंग की जाती है। व्यस्क और अवयस्क गिद्धों की गिनती होती है। उनके घोंसलों की भी गिनती की जा रही है। अंडे से जीवित निकलने का सक्सेस रेट 50% गिद्ध साल में एक ही बार अंडे देते हैं। साइज में यह मुर्गी के अंडे से तीन गुना बड़े होते हैं। मई-जून से अक्टूबर के दौरान मैटिंग सीजन और अंडे देने का समय होता है। अंडे से बच्चे जीवित निकलने का सक्सेस रेट 50% माना जाता है। यही वजह है कि आधे अंडे विकसित नहीं होते हैं। अंडे से 55 दिन में बच्चा निकलता है। चार महीने बच्चा घोंसले में रहता है। फिर वह उड़ने के लिए तैयार हो जाता है। इसलिए कम हो गई थी गिद्धों की संख्या एक आंकड़े के अनुसार, वर्ष 1990 से 92 में भारत में 4 करोड़ गिद्ध थे। साल दर साल ये संख्या कम होती गई। पशुओं को दर्द, सूजन आदि के दौरान डायक्लोफेनाक दवा दी जाती है। इनके खाने के बाद मरने वाले पशु या जानवर का मांस गिद्ध खाते हैं। दवा के प्रभाव से गिद्धों की ज्यादा मौत हो जाती है। यह दवा प्रतिबंधित की गई है।


