इंदौर में टीचर्स के मीम्स बनाए तो स्कूल से निकाला:सुप्रीम कोर्ट ने ICSE बोर्ड और MP सरकार से 13 फरवरी तक मांगा जवाब

इंस्टाग्राम पर शिक्षकों के मीम्स साझा करने के आरोप में इंदौर के एक प्रतिष्ठित स्कूल से निकाले गए 14 वर्षीय छात्र को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी उम्मीद जगी है। इस मामले में हस्तक्षेप करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि बच्चे की शिक्षा किसी भी कीमत पर बाधित नहीं होनी चाहिए। जस्टिस बी.वी. नागरथना और जस्टिस उज्जल भुयान की बेंच ने मध्य प्रदेश सरकार, आईसीएसई बोर्ड और स्कूल प्रबंधन सहित सभी संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर 13 फरवरी 2026 तक जवाब मांगा है। कोर्ट की दो टूक: अनुशासन जरूरी, लेकिन भविष्य दांव पर नहीं
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि यह मामला केवल स्कूल के अनुशासन तक सीमित नहीं है, बल्कि एक बच्चे के शैक्षणिक भविष्य से जुड़ा है। अदालत ने प्रशासन से पूछा है कि छात्र को बोर्ड परीक्षा में शामिल कराने के लिए क्या व्यावहारिक रास्ता निकाला जा सकता है? कोर्ट ने निर्देश दिया कि सभी संबंधित अथॉरिटी अपने जवाब में यह स्पष्ट करें कि छात्र की शिक्षा जारी रखने के लिए किस संस्था की क्या जिम्मेदारी होगी। यह है पूरा मामला
यह विवाद इंदौर के लिटिल वंडर्स कॉन्वेंट स्कूल का है। आरोप है कि 9वीं कक्षा के एक छात्र ने अपने दो दोस्तों के साथ मिलकर इंस्टाग्राम पर एक प्राइवेट अकाउंट बनाया और वहां शिक्षकों से जुड़े कुछ आपत्तिजनक मीम्स शेयर किए। स्कूल प्रबंधन को जब इसकी जानकारी मिली, तो उन्होंने इसे घोर अनुशासनहीनता मानते हुए छात्र को स्कूल से निष्कासित (Expel) कर दिया। इंदौर हाईकोर्ट से राहत नहीं मिलने के बाद छात्र के परिवार ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। वकील की दलील: बच्चे पर ‘आपराधिक मंशा’ नहीं थोप सकते
याचिकाकर्ता की ओर से एडवोकेट निपुण सक्सेना ने कोर्ट में दलील दी कि स्कूल की कार्रवाई पूरी तरह से असंगत है। उन्होंने कहा कि कथित गलती के बदले स्कूल से निकाल देना बहुत बड़ी सजा है। 13-14 साल के बच्चे में किसी को अपमानित करने की आपराधिक मंशा नहीं खोजी जा सकती। अगर ऐसे निष्कासन को सही माना गया, तो स्कूलों को बच्चों के मोबाइल और उनकी प्राइवेट डिजिटल लाइफ पर असीमित निगरानी का अधिकार मिल जाएगा, जो उनकी निजता का उल्लंघन है। हाईकोर्ट ने क्या कहा था?
इससे पहले इंदौर हाईकोर्ट ने छात्र को राहत देने से इनकार कर दिया था। हाईकोर्ट का तर्क था कि समाज में एक सख्त संदेश जाना चाहिए ताकि छात्र इस तरह की गतिविधियों से दूर रहें। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने अब इस सख्त संदेश और शिक्षा के अधिकार के बीच संतुलन बनाने की पहल की है। अगली सुनवाई पर टिकी नजरें
अब 13 फरवरी को होने वाली अगली सुनवाई बेहद अहम होगी। कोर्ट यह तय कर सकता है कि छात्र उसी स्कूल से परीक्षा देगा या बोर्ड उसे किसी अन्य सेंटर से परीक्षा में बैठने की विशेष अनुमति देगा। अदालत का मुख्य फोकस इस बात पर है कि छात्र का शैक्षणिक सत्र खराब न हो।

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