भास्कर न्यूज | पोंड़ी ग्राम पोंड़ी के जामा मस्जिद में बीते 10 दिन तक जिक्रे शोहदा-ए-कर्बला का आयोजन किया गया। इस धार्मिक कार्यक्रम का रविवार देर रात को समापन हुआ। बीते 10 दिन की तकरीर जामा मस्जिद पोड़ी के इमामों खतीब हाफिज व कारी अल्लामा मौलाना मोहम्मद इरफान रजा मिस्बाही ने की है। रविवार को यहां अंतिम दिन था। अंतिम दिन के कार्यक्रम में प्रमुख तौर पर शायरे इस्लाम नाखां वसीम अख्तर नागपुरी, मौलाना मकबूल अहमद, रियाज अहमद कादरी, हाफिज सफदर रजा सिब्तैनी, नायब इमाम जामा मस्जिद पोंड़ी मौलाना शफीक रजा उपस्थित थे। तकरीर में मोहम्मद इरफान रजा मिस्बाही ने शोहदा-ए-कर्बला के किरदार पर संक्षेप में कई पहलु पर प्रकाश डालते हुए कहा कि हजरत इमाम हुसैन से मुहब्बत का तकाजा यह है कि उनके किरदार व विशेषता को मुस्लिम समुदाय अपनी जिंदगी में दाखिल करें। बलिदान व त्याग के पैगाम को दुनिया में पहुंचाए व उस पर अमल करें। कर्बला में इमाम हुसैन ने धैर्य का परिचय दिया और नमाज को प्राथमिकता दी। इमाम हुसैन को कर्बला के तपते हुए रेगिस्तान पर इस्लाम की हिफाजत के लिए तीन दिन व रात भूखा प्यासा रहना पड़ा। जंग में भयानक मंजर था मो इरफान रजा मिस्बाही ने कहा कि कर्बला जंग 680 ईस्वी का सबसे भयानक मंजर था। उस दौर में यजीद बिन मुआविया खलीफा था। हजरत इमाम हुसैन,जो पैगंबर मुहम्मद के पोते थे। उन्होंने यजीद की बुरे काम के खिलाफ आवाज उठाई। इमाम हुसैन यजीद के खिलाफ थे,इसलिए वे अपने कुछ साथियों और परिवार के साथ कूफा जा रहे थे,लेकिन रास्ते में कर्बला यानी(आज का इराक) में यजीद की फौज ने उन्हें चारों ओर से घेर लिया था। अपनी सेना के साथ मिलकर यजीद ने इमाम हुसैन और उनके काफिले पर अत्याचार करना शुरू कर दिया था। कर्बला की दास्तां सुनाई गई मस्जिद में 10 दिन तक चले इस कार्यक्रम में प्रतिदिन कर्बला की दास्तां बताई गई। दास्तां को सुनकर लोगों की आंख नम हो गई। वहीं, रविवार को कार्यक्रम में शायरे इस्लाम नाखां वसीम अख्तर नागपुरी को सुनने के लिए बड़ी संख्या में लोग मौजूद थे।


