राजधानी से सटे परसूलीडीह और खोरपा पूर्व माध्यमिक शाला में सुबह का वक्त है। सारी कक्षाएं भरी हैं लेकिन कैंपस में सन्नाटा है, क्योंकि बच्चों की छमाही परीक्षा चल रही हैं। छठवीं की परीक्षाएं जिस कक्षा में चल रही हैं, वहां एक-दो ऐसे छात्र भी हैं जो प्रश्नपत्र को कभी आंखों के करीब लाते हैं तो कभी दूर ले जाते हैं। उसके बाद ही उन्हें प्रश्न दिखता है और वे आंसर लिखते हैं। छात्रों ऐसा क्यों कर रहे, इसका जवाब तलाशने पर पता चला उन्हें दृष्टि बाधा होने से कम दिखाई देता है। ये स्थिति राजधानी समेत राज्य के करीब 13,600 से ज्यादा पूर्व माध्यमिक स्कूलों की है। कहीं एक, तो कहीं दो कहीं 10-11 छात्र ऐसे हैं जिन्हें कम दिखाई देता है। स्वास्थ्य विभाग हर साल औसतन 40 हजार ऐसे बच्चों की पहचान और परीक्षण कर चश्मे बांटता है। इस साल शिक्षा का आधा सत्र गुजर चुका है, लेकिन बच्चों को चश्मे नहीं बांटे गए। चश्मे नहीं मिल पाने से दूर या पास से जिन छात्रों को कम दिखाई देता है, वे परेशान हो रहे हैं। आमतौर पर शिक्षा सत्र शुरू होने के साथ जुलाई में ही स्वास्थ्य विभाग की टीम को फील्ड में उतार दिया जाता है, ताकि दृष्टिबाधित छात्रों की पहचान हो सके और उन्हें चश्मे मिल जाएं। ऐसा पहली बार हुआ है जब शिक्षा सत्र आधे से ज्यादा गुजर जाने के बावजूद चश्मे नहीं बांटे गए। पिछले साल 11 बच्चे मिले थे, इस साल जांच ही नहीं राजधानी से सटा खोरपा गांव। बस्ती के बीच आत्मानंद अंग्रेजी स्कूल और उसी कैंपस में हिंदी की कक्षाएं अलग-अलग पालियों में लगती हैं। भास्कर टीम जब स्कूल पहुंची, तो वहां मिडिल की परीक्षाएं चल रही थीं। स्टाफ रूम में बैठी शिक्षिका ने बताया- हमारे यहां पिछले साल 11 बच्चे ऐसे निकले थे, जिन्हें दूर से बोर्ड पर लिखा नहीं दिखता था। यहां जांच में नजर कमजोर होने का पता चला था। तब उन्हें चश्मा मिला था। इस साल अब तक जांच नहीं हुई। इस कारण ऐसे बच्चों का पता नहीं है। ये है स्कीम स्वास्थ्य विभाग हर साल सत्र शुरू होने के साथ ही हर जिले के सरकारी और निजी स्कूलों में 6वीं से 8वीं तक यानी मिडिल स्कूल के छात्रों का नेत्र परीक्षण करता है। इस दौरान जिन बच्चों को चश्मे की जरूरत पाई जाती है, उन छात्रों का रिकॉर्ड जिले के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी को भेजा जाता है। रिकार्ड के आधार पर सरकारी अस्पताल की टीम खुद दोबारा स्कूल पहुंचकर जांच करती है। फिर ये पता लगाती है कि उन्हें कितने नंबर के चश्मे की जरूरत है। इसके बाद जिला मुख्यालय से चश्मा छात्रों को दिया जाता है। दो माह पहले जांच की थी, चश्मा अब तक नहीं पुरानी धमतरी रोड पर स्थित कोलर गांव। रोड से करीब 2 किमी दूर बस्ती में स्कूल। भास्कर टीम जब पहुंची तो स्कूल संचालन समिति की बैठक चल रही थी। परीक्षा भी जारी थी, पर बच्चे जा चुके थे। शिक्षकों ने बताया कि अक्टूबर में टीम आई थी। बच्चों की आंखों का टेस्ट हुआ था, पर चश्मे नहीं मिले। स्वास्थ्य विभाग वाले खुद बांटते हैं। बजट मिलने में देरी हुई है, जल्द वितरण करेंगे इस साल कुछ तकनीकी कारणों से बजट मिलने में देरी हुई है। इस कारण स्कूली बच्चों को चश्मा वितरण नहीं किया जा सका है। फिलहाल जहां बच्चों का नेत्र परीक्षण हो चुका है, वहां वितरण की तैयारी है। जल्द चश्मे छात्रों को उपलब्ध करा िदए जाएंगे।
-डाॅ. निधि ग्वालरे, राज्य अंधत्व निवारण कार्यक्रम प्रभारी एक्सपर्ट – जांच नहीं की तो कमजोर नजर वाले बच्चों को सकता है एम्लायोपिया डाॅ. सुभाष मिश्रा, नेत्र रोग विशेषज्ञ और रिटायर्ड राज्य अंधत्व निवारण कार्यक्रम प्रभारी स्कूलों में जांच का सिस्टम जरूरी है। परीक्षण के बाद 6वीं से 8वीं तक के बच्चों की जांच का निर्णय लिया गया है। कई बार बच्चों को एक आंख से कम दिखाई देता है, लेकिन वे ध्यान नहीं दे पाते क्योंकि दूसरी आंख से उनका काम चल जाता है। वे माता-पिता को भी नहीं बताते हैं। लंबे समय तक यही स्थिति रहने पर बच्चों की आंखों में एम्लायोपिया का खतरा रहता है। इसमें आंखों की रोशनी जाने का डर रहता है। स्कूल में जांच होने से कमजोर नजर या एक आंख से कम दिखने वाले बच्चे की पहचान हो जाती है। इलाज शुरू होने के साथ उन्हें चश्मा भी मिल जाता है। शिक्षकों को उनकी कमजोरी के बारे में पता चल जाता है।


