यदि कोई कर्मचारी स्वेच्छा से कर्मचारी भविष्य निधि (ईपीएफ) योजना का विकल्प चुनता है और सेवानिवृत्ति के समय इसके सभी लाभ प्राप्त कर लेता है, तो वह बाद में राज्य सरकार से पेंशन या रिटायरमेंट वेतन का दावा नहीं कर सकता। झारखंड हाईकोर्ट की जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस राजेश कुमार की पीठ ने कहा कि वर्षों तक मौन रहकर वित्तीय लाभ स्वीकार करने के बाद इस तरह की मांग कानून की दृष्टि में स्वीकार्य नहीं है। मामला एक ऐसे कर्मचारी से जुड़ा है जिसकी नियुक्ति 1967 में बिहार सरकार के खाद्य आपूर्ति विभाग में चौकीदार के रूप में हुई थी। 1973 में उसे बिहार राज्य खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति निगम में प्रतिनियुक्ति पर भेजा गया, जहां उसने अपनी सेवानिवृत्ति तक सेवा दी। रिटायरमेंट के बाद कर्मचारी ने दावा किया कि उसकी सेवाएं विधिवत निगम को हस्तांतरित नहीं की गई थीं, इसलिए वह राज्य सरकार से पेंशन का पात्र है। राज्य सरकार ने बताया कि कर्मचारी ने स्वयं ईपीएफ योजना को अपनाया था, नियमित अंशदान जमा किया और सेवानिवृत्ति के समय बिना आपत्ति इसके सभी लाभ स्वीकार कर लिए। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि पेंशन का अधिकार चुने गए विकल्प पर निर्भर करता है। अदालत ने इसे ‘विवंधन’ का मामला बताते हुए सिंगल जज के आदेश को रद्द कर दिया और राज्य सरकार की अपील स्वीकार कर ली।


