मेवाड़ के परंपरागत गवरी नृत्य (डांस) का आज दोपहर बाद वलावण (विसर्जन) होगा। इससे पहले उदयपुर के पुलां गांव के चौक में माता खेड़ा देवी के मंदिर में सोमवार देर रात 12.15 बजे से गवरी कलाकारों की अग्नि परीक्षा हुई। जो रात 1.45 बजे तक चला। अग्नि परीक्षा को देखने दूर-दूर से महिला-पुरुष और बच्चे पहुंचे। गवरी कलाकारों की ये परीक्षा माता खेड़ा देवी मंदिर के माता के सामने हुई। इसमें कलाकारों ने आग की लपटों के ऊपर से मुंह, हाथ-पैर और सीने को निकाला। इसके जरिए कलाकारों ने 40 दिनों की तपस्या की पवित्रता को साबित किया। मान्यता है कि अगर किसी ने 40 दिन की तपस्या का सही तरीके से पालन नहीं किया हो तो उसे अग्नि परीक्षा में नुकसान होता है। भोपाजी मीठालाल गमेती ने बताया कि इसे गवरी में ‘माता जी का होला डालना’ कहते हैं। 10 कलाकार स्वांग रचते हैं गवरी में भाग लेने वाले प्रमुख सदस्यों ने अग्नि परीक्षा दी। इसमें गवरी के भोपा, राई और बुढ़िया सहित करीब 10 लोग शामिल हुए। जो गवरी नृत्य में स्वांग रचते हैं। 40 दिन की तपस्या में मांस, शराब का त्याग करना पड़ता है, इसके बाद होती है अग्नि परीक्षा प्रख्यात लोक कलाविज्ञ और उदयपुर के भारतीय लोक कला मंडल के पूर्व निदेशक स्व. डॉ. महेन्द्र भानावत ने गवरी पर एक किताब लिखी थी। उन्होंने एक लेख में लिखा कि जब गवरी ली जाती है, तब से लेकर गवरी के समापन तक इसके कलाकार एक समय ही भोजन करते हैं। हरी सब्जियों का त्याग रहता हैं। मांस नहीं खाते। मदिरा (शराब) का पान नहीं करेंगे, आंगन में ही सोएंगे, जूते नहीं पहनेंगे। इन नियमों का करीब 40 दिन की गवरी के दौरान पालन किया जाता है। इसी को लेकर अग्नि परीक्षा की परंपरा निभाई जाती है कि कलाकारों ने नियमों का पालन किया या नहीं। ऐसे होती है परीक्षा
भोपाजी मीठालाल गमेती ने बताया कि गवरी विसर्जन से एक दिन पहले की रात मंदिर में माता के सामने यह परीक्षा होती है। लोटा जैसे आकार का मिट्टी का दीपक बनाया जाता है। आटे की लोई का बड़ा दीपक लोटे पर रखा जाता है, जिसमें रुई को घी में भिगोकर आग जलाई जाती है। दीपक को लकड़ी की चौकी (बाजोट) पर रखा जाता है। इसके बाद गवरी के एक-एक करके मुख्य किरदारों की परीक्षा होती है, ये कलाकार क्रम से आते हैं और अपने मुंह, कंधे, सीने, घुटने, पांव को आग के ऊपर से निकालते हैं। मान्यता- 40 दिन नियम का पालन नहीं करने पर आग से नुकसान होता है परीक्षा का मतलब है कि इसमें किसी कलाकार को कुछ भी नहीं होता है, मतलब वह पास हो गया। ऐसी मान्यता है कि यदि किसी ने नियम का पालन नहीं किया होता तो उसे आग से नुकसान पहुंच जाता है। अब जानिए गवरी के बारे में इसलिए होता है गवरी नृत्य
गवरी नृत्य मां पार्वती की पूजा-अर्चना से शुरू होता है, जिन्हें आदिवासी समुदाय में गोरजा माता भी कहते हैं। जिस दिन गोरजा की प्रतिमा बनाई जाती है, उसे गलावण कहते हैं। जिस दिन इसका विसर्जन किया जाता है उसे वलावण कहते हैं। आदिवासी भील समाज में पार्वती को बहन और बेटी के रूप में मानते हैं। समाज में मान्यता है कि भादवा महीने में भगवान शिव के साथ माता पार्वती धरती पर भ्रमण के लिए आती हैं। ऐसे में गवरी नृत्य और नाटक के जरिए आदिवासी भील समाज के लोग उन्हें खुश करने की कोशिश करते हैं। पुलां गांव के लोगी लाल पटेल ने बताया कि बरसों से गवरी की परंपरा निभा रहे हैं और आगे भी यह क्रम चलता रहेगा। आज होगा विसर्जन आज दोपहर में गौरज्या माता की सवारी निकाली जाएगी। सवारी के साथ गवरी कलाकार नृत्य करते हुए जलाशय (नदी-तालाब) किनारे पहुंचेंगे और वहां गौरज्या माता की मूर्ति (मिट्टी की प्रतिमा) और ज्वारों का विसर्जन किया जाएगा।


