एक अफसर पर 40 केस की जांच की जिम्मेवारी, नतीजा… 99% मामले लंबित

साइबर अपराध थाने में दर्ज होती है औसतन हर माह 25 एफआईआर राजधानी रांची में साइबर अपराध थाना की व्यवस्था को ही मजाक बना दिया गया है। साइबर अपराध थाना का सृजन तो हुआ, लेकिन वहां इंस्पेक्टर और जवानों के पदों की संख्या स्वीकृत ही नहीं की गई। जरूरत के हिसाब से जिले के पुलिसकर्मियों से काम लेने का आदेश दिया गया है। वहीं मुख्यालय डीएसपी-2 को थानेदार का प्रभार दिया गया है। प्रतिमाह जिस साइबर अपराध थाने में औसतन 25 एफआईआर दर्ज हो रही हैं, वहां मात्र 7 इंस्पेक्टर तैनात हैं। इनके जिम्मे 300 से ज्यादा केस के अनुसंधान का भार है। एक-एक पदाधिकारी को 35-40 केस के अनुसंधान की जिम्मेदारी दी गई है। पिछले 11 महीने में अबतक मात्र 4 केस निष्पादित हुए हैं, 99 प्रतिशत केस पेंडिंग हैं। प्रत्येक महीने केस का लोड बढ़ता ही जा रहा है। यही वजह है कि पुलिस पदाधिकारी को पहले से पेंडिंग केस पर काम करने का समय नहीं मिल पा रहा है। पुलिस पदाधिकारी काम तो कर रहे हैं, लेकिन अनुसंधान के लोड से दबे हुए हैं। हर इंस्पेक्टर के जिम्मे इतने काम…
ठगी में इस्तेमाल होने वाले ऐप की जानकारी जुटाना
ठगी में प्रयोग किए गए मोबाइल नंबर और अकाउंट का डिटेल निकालना उपलब्ध कराए गए नंबर और अकाउंट का सत्यापन करना आरोपी को चिह्नित कर उसका सत्यापन करना साक्ष्य संकलन करना कोर्ट से वारंट निर्गत कराना गिरफ्तार कर जेल भेजना कोर्ट में चार्जशीट फाइल करना निर्धारित ति​थि पर जाकर गवाही देना और सजा दिलाना अफसरों की कमी से ये परेशानियां… एफआईआर पेंडिंग की संख्या बढ़ती जा रही ठगी के बाद आरोपी की नहीं हो पा रही पहचान गिरफ्तारी नहीं होने से एक के बाद एक लगातार हो रहीं घटनाएं कई कांड में पीड़ित को नहीं मिल पा रहा ठगी का पूरा पैसा तैनात इंस्पेक्टर पर क्षमता से अधिक लोड 6 माह में ही 4 इंस्पेक्टर का तबादला साइबर अपराध थाने में इंस्पेक्टर की पोस्टिंग तो होती है। पिछले एक वर्ष में 4 इंस्पेक्टर ड्यूटी करने के लिए साइबर अपराध थाना भेजे तो गए, लेकिन 6 महीने के दौरान ही उनका ट्रांसफर कर दिया गया। इनकी जगह पर किसी दूसरे इंस्पेक्टर की पोस्टिंग भी नहीं की गई। काम के लोड को देखते हुए तीन दिन पहले 2 डीएसपी की पोस्टिंग की गई है। हालांकि उन्होंने अबतक योगदान नहीं दिया है। दो एएसआई और 8 सिपाही भी हैं तैनात साइबर अपराध थाने में 7 इंस्पेक्टर के अलावा दो एएसआई और 8 सिपाही भी कार्यरत हैं। एक एएसआई को कोर्ट का नोडल पदाधिकारी बनाया गया है, जो सिर्फ कोर्ट से संबंधित मामले देखते हैं। इनके अलावा 6 सिपाही को टेक्निकल काम में लगाया है। इन 6 सिपाही के जिम्मे ही फ्रॉड में इस्तेमाल होने वाले मोबाइल नंबर की कंपनियों व बैंक अकाउंट का डिटेल निकालने के लिए ईमेल करना और अन्य जगहों पर पत्राचार करने की जिम्मेवारी दी गई है। सोशल मीडिया पर किए जाने वाले आप​त्तिजनक पोस्ट और आईडी हैक करने के मामलों को सुलझाना भी इन्हीं 6 सिपाही के जिम्मे होता है। दो सिपाही के जिम्मे थाना पहुंचने वाले पीड़ित की बात सुनकर जानकारी देना और उनसे आवेदन प्राप्त करने का काम है। साइबर अपराध थाना तो बना पर पद ही स्वीकृत नहीं परफॉर्मा प्रमोशन देकर दारोगा से अस्थायी इंस्पेक्टर बने पंकज कुमार, आकाश कुमार, राहुल, कविता मंडल, मनीषा और गौरव कुमार के कंधे पर साइबर अपराध से संबंधित केस के अनुसंधान का जिम्मा है। क्योंकि पद स्वीकृत नहीं हैं। इनके अलावा 2012 बैच के इंस्पेक्टर सतीश गोराई भी तैनात हैं। केस का अनुसंधान करने से लेकर अपराधियों को ट्रैक कर पकड़ने और चार्जशीट दाखिल करने तक की जिम्मेवारी इन्हीं लोगों पर है। प्रभारी के रूप में तैनात मुख्यालय डीएसपी-2 अरविंद कुमार के अलावा डीएसपी श्रीनिवास इनकी मॉनिटरिंग करते हैं। इन्हीं के दिशा-निर्देश पर अनुसंधान कर अपराधियों तक पहुंचने का प्रयास होता है।

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