एक आइडिया से लखपति हुआ किसान:24 बीघा में मॉडर्न तरीके से खेती, दिल्ली सहित कई मंडियों में इनके फल-सब्जियों की डिमांड

अपने गांव वापस लौटने की इच्छा और अपनी जमीन पर आधुनिक खेती की शुरुआत करने की इच्छा ने किसान को सफलता के नए शिखर पर पहुंचा दिया। करीब 17 साल तक जयपुर में प्राइवेट कंपनी में टेक्नीशियन की नौकरी करने के बाद भी उसकी सालाना बचत दो से ढाई लाख के करीब ही रही। वहीं, अब वो मॉडर्न फार्मिंग से सालाना 25 लाख तक की कमाई कर रहे हैं। उनके खेत के फल-सब्जी दिल्ली, जयपुर सहित कई बड़े शहरों में सप्लाई हो रहे हैं। खेती के कारण उनका जीवन बदल गया है। इस सक्सेस के लिए वो अपने स्कूल के शिक्षक को धन्यवाद देते हैं, जिन्होंने उनसे कहा था – उत्तम खेती, मध्यम व्यापार, सेवा-चाकरी करे गंवार। इसलिए वो गांव के और लोगों को भी माडर्न फार्मिंग के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं। खेती-किसानी में आज कहानी झालावाड़ जिले के किसान कालू सिंह की… झालावाड़ मुख्यालय से करीब 25 किलोमीटर दूर मोड़ी गांव में रहने वाले कालू सिंह (48) करीब 24 बीघा पुश्तैनी जमीन पर मॉडर्न तरीके से खेती कर रहे हैं। किसान ने बताया कि साल 2000 में आईटीआई करने के बाद नौकरी के लिए जयपुर चले गए। वहां मीटर बनाने वाली कंपनी में काम किया। करीब 7 साल बाद खेती करने का मन बनाया। सब्सिडी मिली तो पॉलीहाउस लगाया मोड़ी गांव लौटने के बाद खेती के लिए पैसों की व्यवस्था नहीं हो पाई, तो टेलिकॉम कंपनी में टेक्नीशियन की नौकरी की। 10 साल की नौकरी में मुश्किल से ढाई लाख रुपए की बचत हो पाई। मॉडर्न खेती के लिए और रुपए चाहिए थे, ऐसे में तीन लाख रुपए का लोन लिया। सरकार से साढ़े बारह लाख रुपए की सब्सिडी मिली तो साल 2017 में एक बीघा में पॉलीहाउस लगाया। सक्सेस बाद शुरू की मॉडर्न फार्मिंग एक पॉलीहाउस से मिली सक्सेस के बाद किसान ने मॉडर्न फार्मिंग में आगे बढ़ने का फैसला किया। साल 2025 तक किसान ने कुल 24 बीघा जमीन पर पॉलीहाउस, नेट हाउस, मल्चिंग और ड्रिप सिस्टम लगा लिया है। मॉडर्न फार्मिंग से उसकी कमाई सालाना 25 लाख रुपए तक पहुंच गई है। यहां सालभर खीरे का उत्पादन होता है। इसके अलावा दो बीघा में टमाटर और पांच बीघा में तरबूज-खरबूजा की भी खेती की जा रही है। किसान ने चार नेट हाउस में से दो खुद के स्तर पर लगाए गए हैं, जिन पर करीब 50 लाख रुपए खर्च हुए। फसलों को रोगों से बचाती है मल्चिंग तकनीक किसान कालू सिंह ने बताया कि मल्चिंग फसलों को जमीनी रोगों से बचाती है। मल्चिंग शीट में प्रति दो बीघा के हिसाब से 15 हजार रुपए का खर्च आता है। वहीं, ड्रिप सिस्टम में प्रति दो बीघा करीब 30 हजार रुपए खर्च होते हैं। फसल बदलने के साथ ही मल्चिंग शीट बदलनी पड़ती है। बिना फ्रिज सात दिन तक खराब नहीं होते जैविक तरीके से तैयार टमाटर स्वाद और गुणवत्ता में बाजार के सामान्य टमाटरों से बेहतर होते हैं, यही कारण है कि उपभोक्ता इन्हें खास तौर पर पसंद करते हैं। तुड़ाई ब्लॉक के अनुसार प्रतिदिन की जाती है, जिससे बाजार में ताजा माल लगातार उपलब्ध रहता है। जैविक टमाटर बिना फ्रिज के भी एक सप्ताह तक खराब नहीं होते। बाजार में मिलने वाले सामान्य टमाटर एक-दो दिन में सड़ने लगते हैं। इसलिए उनके टमाटर दिल्ली, जयपुर सहित कई बड़ी मंडियों तक जा रहे हैं। साल में तीन बार तरबूज-खरबूजा किसान कालू सिंह ने बताया कि तरबूज और खरबूजा बारिश के सीजन की फसल मानी जाती है, लेकिन बारिश के अलावा भी इनकी बाजार में मांग रहती है और अच्छे भाव मिलते हैं। मल्चिंग और ड्रिप सिस्टम से साल में तीन बार उत्पादन लिया जा सकता है। अक्टूबर में पांच बीघा में तरबूज और खरबूजा की फसल लगाई गई थी। दिसंबर में करीब 20 टन उत्पादन हुआ, जिसे दिल्ली मंडी में अच्छा भाव मिला। सवा लाख रुपए खर्च निकालने के बाद करीब एक लाख पच्चीस हजार रुपए का मुनाफा हुआ। अब फिर से फसल लगाई गई है, जिससे मार्च में उत्पादन मिलेगा। मार्च में उत्पादन के बाद फिर से फसल लगा दी जाएगी। जैविक तरीके से अच्छा उत्पादन कालू सिंह ने बताया कि टमाटर और तरबूज-खरबूजा की फसल में रासायनिक दवाओं का इस्तेमाल नहीं किया जाता। बीमारियों से बचाव के लिए जीवामृत, छाछ और प्राकृतिक घोल का उपयोग किया जाता है। जीवामृत गोबर, गोमूत्र, बेसन और पीपल या बरगद के नीचे की मिट्टी से तैयार किया जाता है, जिसे आठ दिन तक सड़ाकर ड्रिप के माध्यम से फसलों में दिया जाता है। सभी फसलों में जीवामृत नियमित रूप से दिया जाता है। इसके अलावा छाछ में तांबे की धातु डालकर दो महीने रखने के बाद उसका स्प्रे किया जाता है। 100 ग्राम घोल को 15 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव किया जाता है। इससे फसल सुरक्षित रहती है और खर्च भी बेहद कम आता है। सभी सामग्री को 200 लीटर के ड्रम में डाला जाता है और सात दिन तक रखा जाता है। ड्रम में घोल को क्लॉकवाइज घुमाया जाता है, जिससे बैक्टीरिया आपस में टकराते नहीं हैं। घोल को छानने के बाद ड्रिप के जरिए फसल में दिया जाता है, जिससे बेहतर उत्पादन मिलता है। …. खेती-किसानी से जुड़ी ये खबर भी पढ़िए… सरकारी नौकरी छूटी, अब स्ट्रॉबेरी से लाखों की कमाई:परीक्षा कैंसिल होने से हुई थी निराशा; मॉडर्न खेती ने बदली किस्मत, पुणे से लाया पौधे सरकारी नौकरी का सपना आंखों में था और मेहनत भी पूरी थी। अकाउंटेंट पद पर सिलेक्शन भी हुआ, लेकिन एक फैसले ने सब कुछ रोक दिया। सरकार ने परीक्षा ही रद्द कर दी। जहां कई लोग हार मान लेते, वहां चार साल तक टूटी हुई हिम्मत को बांधे रखा। (पूरी खबर पढ़ें)

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