एक ही गांव के लोग अलग-अलग पंचायत में मतदान करेंगे:मूल वोट बैंक को बांट दिया, मारवाड़ के 3 राजनीतिक परिवारों के गढ़ की सीमाएं बदलीं

जोधपुर जिले में पंचायतीराज चुनाव से पहले परिसीमन प्रक्रिया पूरी हो गई है। इसका अंतिम ड्राफ्ट अभी जारी नहीं हुआ है, लेकिन इससे पहले ही बड़ा सियासी अखाड़ा बनता नजर आ रहा है। 31 दिसंबर 2025 को ड्राफ्ट प्रकाशन के बाद मारवाड़ के तीन दिवंगत दिग्गज नेता परसराम मदेरणा, रामसिंह विश्नोई और खेतसिंह राठौड़ के गढ़ (ओसियां, शेरगढ़, लूणी) में सीमाओं में बदलाव किया गया है। इसमें कई जगह एक ही गांव के लोग अलग-अलग पंचायत में वोट डालेंगे। कई जगह मूल वोट बैंक को अलग-अलग वार्ड में करके बांट दिया गया। इससे चुनाव में वोटर बंट जाने की संभावना है। मौजूदा डेटा और कांग्रेस के आरोपों के मुताबिक, परिसीमन का मुख्य उद्देश्य मारवाड़ के तीन प्रभावशाली परिवारों की जड़ों को कमजोर करना है। विवाद का सबसे बड़ा कारण आपत्तियों के निपटारा में हो रही देरी है। मामले में 7 जनवरी तक आपत्तियां मांगी गई थीं। 5 दिन बीतने के बाद भी प्रशासन अंतिम ड्राफ्ट जारी नहीं कर पाया है। कांग्रेस का आरोप है कि इस ‘देरी’ का इस्तेमाल भाजपा विधायक विपक्ष की आपत्तियों को देखकर उसे सुधारने की बजाय अपने फायदे के लिए ‘दोबारा तोड़फोड़’ करने में कर रहे हैं। राजनीतिक टारगेट: 3 परिवारों की विरासत को कमजोर करने का प्लान ग्राउंड रिपोर्ट: कहीं गांव बंटे, कहीं 20 किमी दूर जोड़ी पंचायत
ग्रामीण स्तर पर आक्रोश बरकरार पर है। लोहावट की रड़काबेरा पंचायत को दो हिस्सों में बांट दिया गया है। इससे एक ही गांव के लोग अलग-अलग पंचायत में वोट डालेंगे। बासनी खारिया गांव को फुटबॉल की तरह कभी इधर तो कभी उधर शिफ्ट किया जा रहा है। टेपू-टेकरा-सिहड़ा में भौगोलिक दूरी की अनदेखी कर पंचायतों को ऐसे जोड़ा गया है कि ग्रामीणों को पंचायत मुख्यालय जाने के लिए 15-20 किलोमीटर का चक्कर लगाना पड़ेगा। बिलाड़ा का विवाद: नाम और मुख्यालय पर भ्रम
बिलाड़ा क्षेत्र में नवगठित भैरू नगर ग्राम पंचायत मुख्यालय को लेकर असमंजस है। पहले इसका नाम भैरू नगर, फिर महाराजा नगर किया गया। अब दोबारा संशोधन की चर्चा है। इससे स्थानीय ग्रामीणों में भ्रम और आक्रोश है। ‘असंतुलन’: एक वार्ड में 16 हजार, तो दूसरे में 3 हजार पर एक सदस्य
पंचायती राज संस्थाओं में ‘समान प्रतिनिधित्व’ और ‘एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य’ का दावा हकीकत से परे नजर आ रहा है। पुनर्गठन के प्रारूप का ‘डेटा एनालिसिस’ करने पर कई चौंकाने वाली विसंगतियां सामने आईं। इनमें कहीं एक वार्ड सदस्य 16 हजार लोगों का प्रतिनिधित्व कर रहा है। तो कहीं महज 3 हजार लोगों पर ही एक नेता चुन लिया जाएगा। जनसंख्या का यह 5 गुना अंतर भविष्य में विकास कार्यों में भारी असमानता का कारण बन सकता है। पीपाड़ शहर: ‘सुपर वार्ड’ बनाम ‘मिनी वार्ड’
सबसे बड़ा असंतुलन पीपाड़ शहर पंचायत समिति में देखने को मिला है। आसोप और ओसियां: 4 गुना तक का अंतर
मदेरणा परिवार के प्रभाव वाले ओसियां और आसपास के क्षेत्रों में भी भूगोल के साथ गणित बिगड़ा हुआ है। मंडोर का ‘पाल’ फैक्टर: शहरीकरण की अनदेखी
जोधपुर शहर से सटी मंडोर पंचायत समिति में वार्ड 15 (पाल) की जनसंख्या 11 हजार 905 है। पाल अब पूरी तरह शहरी हो चुका है, लेकिन पंचायती राज में इसे अब भी एक सामान्य ग्रामीण वार्ड की तरह ट्रीट किया जा रहा है। यह अकेला वार्ड पास के 3 वार्डों के बराबर है। साइड इफेक्ट : विकास में भेदभाव की संभावना
इस जनसंख्या असंतुलन का सबसे प्रतिकूल प्रभाव अगले 5 साल तक विकास कार्यों पर पड़ने की संभावना जताई जा रही है। आमतौर पर पंचायत समिति सदस्य को विकास के लिए समान फंड मिलता है। अगर वार्ड 11 (16 हजार आबादी) और वार्ड 6 (3 हजार आबादी) को बराबर फंड मिला तो बड़े वार्ड के लोगों के हिस्से में विकास का पैसा ‘ऊंट के मुंह में जीरा’ साबित होगा।

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