अचानकमार टाइगर रिजर्व के कोर जोन में अभी भी 19 गांव हैं। इन गांवों को अब तक नहीं हटाया जा सका है, जबकि एटीआर को बाघों का रहवास बनाने के लिए चल रहे प्रयासों में सबसे बड़ा रोड़ा जंगल के अंदर बसे ये गांव और यहां पल रहे मवेशी हैं। जंगल के अंदर पहले दैहान हुआ करते थे। एटीआर के अफसरों ने इन्हें अब अब कैटल कैंप का नाम दे दिया है। अब ये घने जंगल के अंदर न होकर गांव–गांव में जा बसे हैं। दैहान संचालकों ने ग्रामीणों के पास अपने दुधारू पशु रखवा दिए हैं। इन पशुओं के लिए जंगल में चारे की कमी नहीं है, क्योंकि शाकाहारी वन्यप्राणियों को भोजन उपलब्ध कराने के लिए 15 हजार एकड़ जमीन पर वन विभाग ने चारागाह विकसित कर दिया है। इस चारागाह का भरपूर उपयोग ग्रामीण अपने मवेशियों के लिए कर रहे हैं। अचानकमार टाइगर रिजर्व को विकसित करने और पर्यटकों की रुचि के लायक बनाने का प्रयास प्रबंधन लगातार कर रहा है। पिछले 4–5 वर्षों में एटीआर में जुटाई गई सुविधाओं ने वन्यप्राणियों को फलने फूलने का मौका दिया। पर्याप्त चारा और पानी वन्यप्राणियों की सबसे बड़ी आवश्यकता है। इसकी वजह से ही उन्हें मजबूत रहवास का अहसास होने लगा है और वे यहीं पर रचने बसने लगे हैं। बाघों को भी एटीआर भा गया है। इसकी इनकी संख्या तेजी से बढ़ रही है। एटीआर अचानकमार टाइगर रिजर्व में हर साल औसत 6 हजार के लगभग पर्यटक घूमने के लिए आते हैं। यह आंकड़ा पिछले 3 साल का है। इससे पहले कोरोना काल की वजह से पर्यटक नहीं आए थे। पिछले तीन वर्षों में ही पर्यटकों की संख्या बढ़ी है। हालांकि कान्हा में हर साल लाखों की संख्या में देश और विदेश से पर्यटक आते हैं। व्यवस्था बढ़ाने और बेहतर कनेक्टिविटी से एटीआर में भी पर्यटक बढ़ाए जा सकते हैं। एटीआर के कोर जोन में वर्तमान में 19 गांव तिलई डबरा, बिरारपानी, छिरहट्टा, अचानकमार, बिंदावल, सारसडोल, छपरवा, लमनी, अतरिया, रजकी, सुरही, अतरिया, कटामी, जकड़बांधा, महामाई, बम्हनी, निवासखार, डगनिया और राजक हैं। अब तिईडबरा, बिरारपानी और छिरहट्टा को एटीआर के दायरे से बाहर करने की तैयारी है। इससे पहले जल्दा, कूबा,बहाउड़, बांकल, बोकराकछार और सांभरधसान गांव को शिफ्ट किया जा चुका है। वर्तमान में जितने गांव हैं, वहां हर ग्रामीण के पास पालतू मवेशी हैं।


