शादी के दो साल बाद भोपाल के एक कपल ने बच्चा प्लान करने का फैसला किया लेकिन मेडिकल समस्याओं के कारण गर्भधारण नहीं हो पाया। अगले 4-5 साल तक कई डॉक्टर्स की सलाह, दवा के बाद भी जब कोई समाधान नहीं हुआ तो उन्होंने सरोगेसी यानी अन्य महिला से उधार की कोख लेने का फैसला किया। इसके बाद सरोगेसी के लिए राजी होने वाली महिला को तलाशना और सरकारी प्रक्रिया पूरा करना इतना पेचीदा रहा कि उन्होंने बच्चा गोद लेने के बारे में भी सोचना शुरू कर दिया। यूं तो ये एक परिवार की कहानी है लेकिन ऐसे कई परिवार हैं, जो सरकारी प्रक्रिया में लेटलतीफी से सरोगेसी का प्लान छोड़ देते हैं। ऐसे परिवारों के लिए अब राहत की खबर है। मध्यप्रदेश सरकार ने सरोगेसी प्रक्रिया को 4 महीने की बजाय अब 10 दिन का कर दिया है। सरकार ने नियम में क्या आसानी की है, पहले क्या परेशानी थी और अब सरोगेसी से मां बनना क्यों मुश्किल नहीं रहेगा… पढ़िए ये रिपोर्ट सबसे पहले जानिए, क्या है सरोगेसी और नए नियम
सरोगेसी एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें एक महिला (सरोगेट मां) दूसरे कपल के बच्चे को जन्म देने के लिए मेडिकल तकनीक से कंसीव करती है। इसे उन दंपतियों के लिए विकल्प माना जाता है, जो शारीरिक कारणों से खुद बच्चे को जन्म नहीं दे सकते। मध्यप्रदेश सरकार ने स्टेट एप्रोप्रियेट अथॉरिटी फॉर एआरटी एंड सरोगेसी (SAA) का गठन किया है, जो अधिक से अधिक बैठक आयोजित करेगी। आवेदन प्रक्रिया को डिजिटल और अधिक पारदर्शी बनाया जाएगा। आवेदन प्रक्रिया अब 7-10 दिन में पूरी होगी। एक महिला ने भास्कर से बातचीत में कहा, “मैं अपनी कोख से बच्चे को जन्म नहीं दे सकती। मैं गर्भधारण करने में असमर्थ हूं। जब मुझे पता चला तो ये किसी मानसिक आघात जैसा था। सरोगेसी से बच्चा पैदा करने की प्रक्रिया लंबी और मानसिक रूप से थका देने वाली है।’ पहले स्टेट बोर्ड की बैठक में जाते थे आवेदन
पहले सरोगेसी के लिए आवेदन प्रक्रिया में चार महीने का समय लगता था। राज्य सरोगेसी बोर्ड की बैठक हर चार महीने में लोक स्वास्थ्य मंत्री की अध्यक्षता में होती थी, जिसमें पूरे प्रदेश के आवेदनों पर निर्णय लिया जाता था। इस प्रक्रिया की वजह से कई कपल्स को मानसिक तनाव का सामना करना पड़ता था। अब इस आवेदन सीमा को घटाकर सिर्फ 7-10 दिन कर दिया गया है। इसका मतलब यह है कि अब सरोगेसी के लिए दंपतियों को महीनों का इंतजार नहीं करना पड़ेगा। अब प्रक्रिया उतनी ही होगी लेकिन स्टेट बोर्ड की जगह आवेदन सीधे स्टेट एप्रोप्रियेट अथॉरिटी फॉर एआरटी एंड सरोगेसी (SAA) को दस दिन के अंदर फॉरवर्ड कर दिए जाएंगे। सरोगेसी के वैज्ञानिक और कानूनी पहलू
सरोगेसी एक ऐसी चिकित्सा प्रक्रिया है, जिसमें एक महिला (जिसे सरोगेट मां कहा जाता है) किसी अन्य दंपती या व्यक्ति के लिए बच्चे को अपने गर्भ में पालती है और जन्म देती है। यह उन दंपतियों या व्यक्तियों के लिए एक विकल्प है, जो किसी मेडिकल कारण से स्वयं संतान को जन्म देने में असमर्थ होते हैं। सरोगेसी में सरोगेट महिला अपने या फिर डोनर के अंडाणु के जरिए गर्भधारण करती है और उस बच्चे के जन्म तक, अपने गर्भ में उसका पालन-पोषण करती है। जन्म के बाद सरोगेट मां का उस बच्चे पर कोई कानूनी अधिकार नहीं रहता। किसे बना सकते हैं सरोगेट मां दो साल में 10 आवेदन स्वीकार किए
लोक स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा आयुक्त तरुण राठी ने बताया कि राज्य सरोगेसी बोर्ड ने मध्यप्रदेश में 2023 से 2025 तक सरोगेसी के कुल 10 आवेदन स्वीकार किए हैं। अक्टूबर 2024 से मध्यप्रदेश ने सरोगेट मदर के लिए दिए जाने वाले इंश्योरेंस को 1 लाख से बढ़ाकर 10 लाख रुपए कर दिया है। एआरटी बैंक और क्लीनिक कैसे काम करते हैं
एआरटी बैंक: एआरटी बैंक (Assisted Reproductive Technology Bank) एक ऐसी जगह है, जहां प्रजनन उपचार के लिए शुक्राणु और अंडाणु को सुरक्षित रखा जाता है और जरूरतमंद लोगों को दिया जाता है। इसे प्रजनन क्लीनिक या एआरटी क्लीनिक भी कहते हैं। लेवल 1 एआरटी क्लीनिक: यहां केवल गर्भधारण के लिए शुक्राणु को सीधे गर्भाशय में डाला जाता है। लेवल 2 एआरटी क्लीनिक: यहां गर्भधारण के लिए ज्यादा जटिल प्रक्रियाएं की जाती हैं, जैसे- ———————— मामले से जुड़ी ये खबर भी पढे़ं… सरोगेसी के नियम बदले, मेडिकल बोर्ड को बतानी होगी बांझपन की वजह शादीशुदा जोड़े अब किसी डोनर से एग या स्पर्म लेकर सरोगेट माता-पिता बन पाएंगे। नए नियम की शर्त यह है कि पति-पत्नी में से कोई एक पार्टनर बच्चा पैदा करने में सक्षम न हो। इससे पहले केंद्र सरकार ने सरोगेसी कानून में संशोधन कर कहा था कि जो कपल सरोगेसी से माता-पिता बनना चाहते हैं, उनमें एग और स्पर्म उनका ही होना चाहिए। मार्च 2023 में किए गए इस संशोधन को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी। पढ़ें पूरी खबर…


