मध्यप्रदेश में SIR (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) के दौरान वोटर कटने का झटका तो पहले ही लग चुका था, लेकिन अब कटे हुए नाम भी वापस नहीं जुड़ पाए हैं। इससे सरकार के मंत्रियों की नींद उड़ी हुई है, क्योंकि वजह चुनावी जीत-हार से जुड़ी है। चुनाव आयोग के फॉर्म-6, 7 और 8 के जरिए वोट जोड़ने की कवायद में सामने आए ताजा आंकड़ों ने सरकार और संगठन की चिंता बढ़ा दी है। चुनाव आयोग के 16 जनवरी तक के आंकड़े बताते हैं कि मंत्रियों की विस सीटों पर जितने वोट कटे, उनके मुकाबले एक-तिहाई फॉर्म भी वोट जोड़ने के लिए नहीं आए। उज्जैन दक्षिण सीट से चुनाव जीतने वाले मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की सीट पर कटे वोटरों के मुकाबले सिर्फ 17% नए आवेदन आए हैं। डिप्टी सीएम राजेंद्र शुक्ला की रीवा सीट पर यह एवरेज 16.9% है। नगरीय विकास मंत्री कैलाश विजयवर्गीय की इंदौर-1 सीट पर महज 11.4% आवेदन आए। बाकी मंत्रियों की हालत भी इनसे अलग नहीं है, इसलिए प्रदेश संगठन चिंतित है। लगातार मॉनिटरिंग की जा रही है। भाजपा की परेशानी की एक और वजह भी है। जिन ‘ए’ और ‘बी’ बूथों को वोट मिलने के लिहाज से भाजपा अपना मानती थी, उनके समीकरण बदल गए हैं। ‘ए’ वाले ‘बी’ और ‘बी’ वाले ‘सी’ और ‘डी’ बन गए हैं। पुरुषों से 3.77 लाख महिलाओं के वोट ज्यादा कटे भाजपा जहां ज्यादा अंतर से हारी वहां नए नाम कम जुड़े
ग्वालियर पूर्व में भाजपा 2023 के विधानसभा चुनाव में 15,353 वोट से हारी थी। एसआईआर के बाद यहां 74,389 वोट कटे, नए नाम सिर्फ 4,758 जुड़े। इसी तरह मुरैना में भाजपा 19,871 वोट से हारी, जबकि यहां 49,156 मतदाता सूची से हटाए गए। लेकिन यहां सिर्फ 1,178 आवेदन नाम जुड़वाने के लिए आए हैं। जानिए आखिर SIR मकसद क्या है…?
1951 से लेकर 2004 तक का SIR हो गया है, लेकिन पिछले 21 साल से बाकी है। इस लंबे दौर में मतदाता सूची में कई परिवर्तन जरूरी हैं। जैसे लोगों का माइग्रेशन, दो जगह वोटर लिस्ट में नाम होना। डेथ के बाद भी नाम रहना। विदेशी नागरिकों का नाम सूची में आ जाने पर हटाना। कोई भी योग्य वोटर लिस्ट में न छूटे और कोई भी अयोग्य मतदाता सूची में शामिल न हो। ये खबर भी पढ़ें…
SIR सर्वे में 87 हजार लोगों को दावे-आपत्ति में जोड़ दिया, अफसर बोले- कॉलम मिस्टेक
एसआईआर के दौरान जारी किए जा रहे आंकड़ों ने बवाल मचा दिया है। जिले से लेकर प्रदेश तक विपक्षी पार्टी कांग्रेस के नेता हैरत में पड़ गए। वे आपत्ति लेने के लिए चुनाव आयोग के पास गए तो अफसरों के कन्फ्यूजन तो दूर कर दिया, लेकिन कांग्रेस ने फिर सख्ती बरतते हुए बूथ लेवल तक मॉनिटरिंग शुरू कर दी है। पढ़ें पूरी खबर…


